खेती का गहराता संकट: बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के बीच पिस रहा किसान

खेती अब केवल मेहनत का काम नहीं रह गई है, बल्कि यह धीरे-धीरे घाटे का सौदा बनती जा रही है। गांव का किसान आज जिस दौर से गुजर रहा है, उसे केवल“मौसम की मार”कहकर नहीं समझा जा सकता। यह संकट खेती की पूरी आर्थिक संरचना का संकट है। रोहिणी नक्षत्र चढ़ते ही खेतों में हल चलेगा, धान का बीज डाला जाएगा, लेकिन इस बार किसान के सामने सबसे बड़ा सवाल फसल नहीं, बल्कि लागत का है।

मौसम विभाग और विभिन्न एजेंसियों के अनुमान पहले ही संकेत दे चुके हैं कि इस वर्ष बारिश सामान्य से कम हो सकती है। इसका सीधा मतलब है कि धान जैसी पानी पर निर्भर खेती में सिंचाई का बोझ कई गुना बढ़ेगा। पहले किसान आसमान देखकर खेती करता था, अब उसे मोटर, डीजल और बिजली देखकर खेती करनी पड़ रही है।

बारिश कम हुई तो रोजाना पानी चलाना पड़ेगा। डीजल पहले से महंगा है, बिजली की आपूर्ति अनियमित है और आने वाले समय में बिजली दरें बढ़ने की संभावना भी लगातार जताई जा रही है। खेती की लागत का संकट केवल सिंचाई तक सीमित नहीं है। प्रति एकड़ जुताई का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ट्रैक्टर का किराया बढ़ा है क्योंकि डीजल महंगा है।

खेत मजदूरी भी तेजी से ऊपर जा रही है। गांवों से मजदूर शहरों की ओर जा रहे हैं, मनरेगा और दूसरे विकल्पों के कारण खेतों में मजदूरों की उपलब्धता कम हो रही है। परिणाम यह है कि रोपाई और कटाई जैसे कामों की मजदूरी हर सीजन में बढ़ रही है। दूसरी तरफ खेती के जरूरी इनपुट्स लगातार महंगे होते जा रहे हैं।

बीज कंपनियां हर साल“नई किस्म”और“हाइब्रिड” के नाम पर दाम बढ़ाती हैं। यूरिया भले नियंत्रित मूल्य पर मिलती दिखे, लेकिन जिंक, पोटाश, डीएपी, फास्फोरस और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। कीटनाशक और फफूंदनाशक की लागत अलग है। अगर मौसम खराब हो गया या रोग लग गया तो किसान को दोबारा स्प्रे करना पड़ता है।

यानी लागत का कोई अंतिम बिंदु नहीं है। अब सवाल यह है कि इतना सब खर्च करने के बाद किसान को मिलता क्या है? धान का सरकारी समर्थन मूल्य लगभग 2300 से 2400 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास रहेगा। औसत उपज एकड़ बिगहा 12 से 15 क्विंटल मान लें, तब भी कुल आमदनी सीमित ही होगी।

अगर कोई किसान लागत का पूरा हिसाब लगाए- जुताई, बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, दवा, कटाई, मड़ाई और परिवहन तो कई जगह वास्तविक बचत बेहद कम निकलती है। छोटे और सीमांत किसान के लिए तो स्थिति और कठिन है क्योंकि उसके पास लागत फैलाने के लिए बड़ा क्षेत्र भी नहीं होता।

यही कारण है कि आज गांवों में खेती“व्यवसाय” कम और“मजबूरी”ज्यादा बनती जा रही है। बहुत से किसान केवल इसलिए खेती कर रहे हैं क्योंकि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं है। खेती अब स्थिर आय का साधन नहीं रही। यह जोखिम का क्षेत्र बन चुकी है, जहां मौसम, बाजार और सरकारी नीतियां तीनों मिलकर किसान की आय तय करते हैं।

सबसे गंभीर बात यह है कि खेती की आय और ग्रामीण जीवन की महंगाई के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। गांव में भी अब दाल, तेल, दवा, शिक्षा, मोबाइल रिचार्ज, शादी-ब्याह और इलाज का खर्च तेजी से बढ़ चुका है। लेकिन फसल का भाव उसी गति से नहीं बढ़ता। किसान अपनी उपज खुले बाजार में बेचते समय कमजोर स्थिति में होता है क्योंकि उसके पास भंडारण की क्षमता नहीं होती। मजबूरी में वह कटाई के तुरंत बाद कम भाव पर फसल बेच देता है।

यह संकट केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक भी है। नई पीढ़ी खेती छोड़ना चाहती है। गांव का युवा अब खेत की ओर नहीं बल्कि शहर की नौकरी की ओर देख रहा है। क्योंकि वह अपने पिता की पूरी जिंदगी खेत में मेहनत करते हुए देखता है लेकिन आर्थिक स्थिरता नहीं देखता।

सरकारी मंचों से कृषि को“रीढ़”कहा जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि खेती की लागत और आय के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर कृषि विकास की बातें करना आसान है, लेकिन खेत में खड़े किसान की वास्तविक चिंता पानी, खाद और मजदूरी का खर्च है।

अगर यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में खेती का स्वरूप बदलना तय है। किसान कम पानी वाली फसलों की ओर जाएगा, छोटे किसान खेती छोड़ेंगे, ठेका खेती और कॉरपोरेट मॉडल बढ़ेंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही रहेगा- क्या खेती करने वाला किसान आर्थिक रूप से सुरक्षित होगा? किसान केवल समर्थन मूल्य नहीं मांग रहा।

वह ऐसी व्यवस्था चाहता है जहां उसकी लागत और मेहनत का वास्तविक मूल्य मिले। क्योंकि अगर खेती लगातार घाटे का सौदा बनती गई, तो केवल किसान ही नहीं, पूरा खाद्य तंत्र संकट में आ सकता है। आज गांवों में जो बेचैनी है, वह केवल मौसम की चिंता नहीं है। वह उस आर्थिक दबाव की आवाज है जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया गया। और जब किसी समाज का अन्नदाता लगातार असुरक्षित महसूस करने लगे, तब वह केवल खेती का संकट नहीं रहता- वह व्यवस्था का संकट बन जाता है।

निष्कर्ष: स्पष्ट है कि वर्तमान में खेती केवल मौसम के उतार-चढ़ाव का शिकार नहीं है, बल्कि लगातार बढ़ती लागत (डीजल, खाद, बीज, मजदूरी) और सीमित आय के कारण एक गहरे आर्थिक और ढांचागत संकट में बदल चुकी है। जब तक किसानों को उनकी मेहनत और निवेश का वास्तविक मूल्य देने वाली नीतियां नहीं बनाई जाएंगी और गांवों में बुनियादी सुधार नहीं होंगे,

तब तक अन्नदाता को इस घाटे के चक्रव्यूह से बाहर निकालना नामुमकिन है; और यदि यह आर्थिक असुरक्षा यूं ही बनी रही, तो युवाओं का कृषि से पूरी तरह मोहभंग होना और अंततः देश की खाद्य सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का चरमराना तय है।

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