ई-विकास पोर्टल से खाद वितरण में समस्या, यूरिया के साथ दूसरी खाद खरीदने को मजबूर किसान

खेत में फसल खड़ी है, लेकिन किसान खाद के लिए भटक रहा है। यही आज मध्य प्रदेश के हजारों किसानों की सबसे बड़ी हकीकत बन चुकी है। खरीफ सीजन अपने सबसे महत्वपूर्ण दौर में है। मक्का को टॉप ड्रेसिंग के लिए यूरिया चाहिए, धान में कल्ले निकालने के लिए नाइट्रोजन की जरूरत है और सोयाबीन की शुरुआती बढ़वार भी इसी समय तय होती है।

ऐसे समय में किसान को सबसे पहले जिस खाद की आवश्यकता है, वह है यूरिया। लेकिन किसानों की शिकायत है कि ई-विकास पोर्टल की व्यवस्था के कारण उन्हें केवल जरूरत की खाद नहीं मिल रही, बल्कि पहले दूसरी खाद खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

यूरिया के लिए पहले अन्य उर्वरक (SSP, NPK) खरीदने की मजबूरी

कई जिलों से किसान लगातार आरोप लगा रहे हैं कि यदि उन्हें यूरिया चाहिए, तो पहले एसएसपी, एनपीके या अन्य उर्वरक का टोकन लेना पड़ रहा है। जिन किसानों ने बुवाई के समय पहले ही डीएपी, एनपीके या एसएसपी का उपयोग कर लिया, उनके सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर वे दोबारा वही खाद क्यों खरीदें?

खेती कोई ऐसा व्यवसाय नहीं है जहां किसान अपनी इच्छा से अतिरिक्त पैसा खर्च करता रहे। किसान हर बोरी खाद सोच-समझकर खरीदता है और उसी समय खरीदता है जब फसल को उसकी आवश्यकता होती है।

खेती की बढ़ती लागत और किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ

आज गांव का किसान पहले से कहीं अधिक आर्थिक दबाव में है। बीज की कीमत बढ़ चुकी है। मजदूरी महंगी हो गई है। डीजल के दाम लगातार ऊंचे हैं। सिंचाई का खर्च अलग है। कीटनाशक और खरपतवारनाशक पहले ही किसानों की जेब खाली कर चुके हैं। ऐसे में यदि किसान के पास केवल यूरिया खरीदने भर का पैसा बचा है और उसे कहा जाए कि पहले दूसरी खाद खरीदो, तब यूरिया मिलेगा, तो यह स्थिति उसके लिए और भी कठिन हो जाती है।

किसानों का कहना है कि पहले व्यवस्था अलग थी। यदि किसी किसान ने पहले यूरिया ले लिया, तो बाद में अन्य खाद का टोकन नहीं बनता था। अब कई जगह किसानों का आरोप है कि नियम बदल गए हैं और पहले अन्य उर्वरक लेना अनिवार्य जैसा बना दिया गया है। यदि ऐसा हो रहा है, तो यह किसानों के लिए चिंता का विषय है। किसान की खेती उसकी जरूरत के अनुसार चलनी चाहिए, किसी तय पैकेज के अनुसार नहीं।

फसलों के लिए टॉप ड्रेसिंग में नाइट्रोजन (यूरिया) का वैज्ञानिक महत्व

कृषि विज्ञान भी यही कहता है कि प्रत्येक उर्वरक का अपना अलग समय और उद्देश्य होता है। बुवाई के समय डीएपी, एनपीके या एसएसपी का महत्व होता है। लेकिन फसल की बढ़वार के समय यूरिया की आवश्यकता सबसे अधिक होती है। यदि किसान ने शुरुआती खाद पहले ही डाल दी है, तो उसे दोबारा वही खाद खरीदने का कोई वैज्ञानिक औचित्य नहीं बनता। खेती का सिद्धांत संतुलित पोषण है, न कि अनावश्यक खरीदारी।

ई-विकास पोर्टल की तकनीकी व्यवस्था में सुधार की मांग

मध्य प्रदेश सरकार ने ई-विकास पोर्टल इस उद्देश्य से लागू किया था कि खाद वितरण में पारदर्शिता आए, कालाबाजारी रुके और वास्तविक किसानों तक उर्वरक पहुंचे। यह उद्देश्य निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन यदि किसी तकनीकी व्यवस्था के कारण किसान अपनी वास्तविक आवश्यकता की खाद समय पर नहीं खरीद पा रहा है, तो उस व्यवस्था की समीक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है। कोई भी डिजिटल प्रणाली तभी सफल मानी जाएगी जब वह किसानों की सुविधा बढ़ाए, न कि उनकी परेशानी।

गांवों से कई किसानों का कहना है कि वे सुबह से समिति या विक्रेता के यहां लाइन में लगे रहते हैं। टोकन निकलवाते हैं। दस्तावेज दिखाते हैं। कई किलोमीटर की यात्रा करके आते हैं। लेकिन अंत में उन्हें बताया जाता है कि पहले दूसरी खाद खरीदनी होगी, तभी यूरिया मिलेगा। ऐसे में किसान के सामने दो ही विकल्प बचते हैं-या तो मजबूरी में अतिरिक्त पैसा खर्च करे या बिना यूरिया के खेत लौट जाए। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं बल्कि तकनीकी नुकसान भी पहुंचा सकती है।

यूरिया की पहली टॉप ड्रेसिंग यदि समय पर नहीं हुई, तो धान में कल्ले कम निकलेंगे, मक्का की बढ़वार प्रभावित होगी और उत्पादन घट सकता है। खेती में समय सबसे बड़ा कारक होता है। जो खाद आज डालनी है, उसका लाभ दस दिन बाद उतना नहीं मिलता। इसलिए समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि हर किसान की मिट्टी अलग होती है। हर खेत की पोषक तत्वों की स्थिति अलग होती है। कई किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद डालते हैं। कई किसानों ने पहले ही संतुलित मात्रा में फास्फोरस और पोटाश का उपयोग कर लिया होता है। ऐसे किसानों को दोबारा वही उर्वरक खरीदने के लिए कहना वैज्ञानिक खेती के सिद्धांतों के भी विपरीत माना जा सकता है।

छोटे और सीमांत किसानों की समस्याएं और समाधान

किसानों की आर्थिक स्थिति पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। अधिकांश छोटे और सीमांत किसानों के पास सीमित नकदी होती है। कई किसान साहूकार या बैंक से उधार लेकर खेती करते हैं। यदि उनके पास इस समय केवल एक-दो बोरी यूरिया खरीदने लायक पैसा है और उन्हें पहले दूसरी खाद खरीदनी पड़े, तो यह अतिरिक्त बोझ उनके लिए भारी साबित हो सकता है।

कई बार किसान ऐसी मजबूरी में निजी दुकानों से महंगे दाम पर खाद खरीदने या कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं। यदि वास्तव में कहीं ऐसी शर्त लागू की जा रही है कि पहले एसएसपी या एनपीके खरीदो, तभी यूरिया मिलेगा, तो प्रशासन को इसकी जांच करनी चाहिए। यदि यह केवल किसी विशेष जिले या विक्रेता की समस्या है, तो उसे तुरंत दूर किया जाना चाहिए। और यदि यह पोर्टल की तकनीकी व्यवस्था का हिस्सा है, तो किसानों के हित में इसकी समीक्षा आवश्यक है।

सरकार का उद्देश्य किसानों तक खाद पहुंचाना है, न कि उन्हें ऐसी खाद खरीदने के लिए प्रेरित करना जिसकी तत्काल आवश्यकता नहीं है। किसान स्वयं अपनी फसल का सबसे बड़ा विशेषज्ञ होता है। वह जानता है कि उसके खेत में इस समय किस पोषक तत्व की जरूरत है। इसलिए उसे अपनी आवश्यकता के अनुसार उर्वरक चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

खाद वितरण व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यही होना चाहिए कि किसान को सही समय पर सही उर्वरक मिले। यदि किसी किसान ने पहले ही एनपीके, डीएपी या एसएसपी का उपयोग कर लिया है, तो उसे केवल यूरिया लेने का अवसर मिलना चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी किसान को केवल पोटाश चाहिए, तो उसे भी वही उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

यही वैज्ञानिक खेती और किसान हित दोनों के अनुरूप होगा। यह भी जरूरी है कि कृषि विभाग किसानों के बीच स्पष्ट जानकारी पहुंचाए। यदि किसी प्रकार का नियम है, तो उसे सार्वजनिक रूप से बताया जाए। यदि कोई अनिवार्यता नहीं है और कहीं स्थानीय स्तर पर गलत तरीके से किसानों को दूसरी खाद खरीदने के लिए कहा जा रहा है, तो उस पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।

भ्रम की स्थिति सबसे अधिक नुकसान किसानों को ही पहुंचाती है। आज जरूरत इस बात की है कि ई-विकास पोर्टल को किसान हितैषी बनाया जाए। तकनीक का उद्देश्य किसान का समय बचाना, भ्रष्टाचार रोकना और खाद वितरण को सरल बनाना होना चाहिए। यदि किसान तकनीक के कारण अधिक परेशान हो रहा है, तो उस व्यवस्था में सुधार करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

खरीफ सीजन के इस महत्वपूर्ण समय में सरकार, कृषि विभाग और जिला प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी किसान को उसकी आवश्यकता के अनुसार उर्वरक समय पर उपलब्ध हो। किसान को एक खाद के बदले दूसरी खाद खरीदने की मजबूरी में नहीं डाला जाना चाहिए। खेती मौसम के अनुसार चलती है, पोर्टल के अनुसार नहीं। यदि समय पर यूरिया नहीं मिला, तो नुकसान केवल किसान का नहीं होगा, बल्कि प्रदेश के कुल कृषि उत्पादन पर भी इसका असर पड़ेगा।

हम किसान केवल इतना चाहते है कि हमे हमारी जरूरत की खाद सही समय पर, निर्धारित मूल्य पर और बिना अनावश्यक शर्तों के मिल जाए। यदि यह सुनिश्चित हो जाता है, तो न हम किसान की लंबी लाइनें लगानी पड़ेंगी, न अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा और न ही फसल पोषण में देरी होगी। यही एक प्रभावी, पारदर्शी और किसान-केंद्रित खाद वितरण व्यवस्था की पहचान होगी।

निष्कर्ष: खरीफ सीजन के इस सबसे महत्वपूर्ण दौर में मध्य प्रदेश के किसानों के लिए यूरिया की समय पर उपलब्धता फसल उत्पादन की नींव है। ई-विकास पोर्टल का उद्देश्य पारदर्शिता लाना है, लेकिन यदि स्थानीय स्तर पर या पोर्टल की व्यवस्था के कारण यूरिया के साथ दूसरी खाद खरीदने की अनिवार्यता जैसी शर्तें थोपी जा रही हैं, तो प्रशासन को तुरंत इस पर संज्ञान लेना चाहिए।

तकनीक तभी सफल है जब वह अन्नदाता के काम को सरल बनाए, न कि उसकी परेशानी और लागत को बढ़ाए। कृषि विभाग को चाहिए कि वह वितरण प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और किसान-अनुकूल बनाए ताकि हर किसान भाई को उसकी आवश्यकता के अनुसार बिना किसी अनुचित शर्त के समय पर खाद मिल सके।

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