उर्वरक की बोरी पर लिखा था 60% पोटाश, जांच में निकला 0%; नकली खाद की ठगी से ऐसे बचें किसान

देश का किसान पूरे साल खेत में पसीना बहाता है। वह मौसम की मार झेलता है, महंगे बीज खरीदता है, कर्ज लेकर खाद और कीटनाशक लाता है, समय पर सिंचाई करता है और इस उम्मीद में मेहनत करता है कि फसल अच्छी होगी तो परिवार का खर्च चलेगा, बच्चों की पढ़ाई होगी और बैंक का कर्ज भी उतर जाएगा। लेकिन जब वही किसान बाजार से खरीदी गई खाद, बीज या कीटनाशक के कारण ठगी का शिकार हो जाता है, तब केवल उसकी फसल ही नहीं, बल्कि उसका पूरा साल बर्बाद हो जाता है।

पोटाश की बोरी में मिला 0% पोटाश: किसानों के साथ बड़ा धोखा

हाल ही में सामने आए एक मामले ने एक बार फिर कृषि व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। समाचार के अनुसार, जिस उर्वरक की बोरी पर 60 प्रतिशत पोटाश लिखा था, प्रयोगशाला जांच में उसमें 0 प्रतिशत पोटाश पाया गया। यदि जांच के निष्कर्ष सही हैं, तो यह केवल गुणवत्ता में कमी का मामला नहीं बल्कि किसानों के साथ गंभीर धोखाधड़ी का आरोप है। किसान जिस पोषक तत्व के लिए पैसा देता है, यदि वह उत्पाद में मौजूद ही नहीं है, तो सबसे बड़ा नुकसान उसकी फसल को होगा।

फसल उत्पादन और पौधों पर नकली पोटाश का प्रतिकूल असर

सोचिए, एक किसान अपनी मेहनत की कमाई से पोटाश खरीदता है क्योंकि उसे बताया जाता है कि इससे दाना भरेगा, पौधा मजबूत होगा, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी और उत्पादन बेहतर होगा। लेकिन अगर बोरी के अंदर वह पोषक तत्व है ही नहीं, तो किसान की फसल को अपेक्षित लाभ कैसे मिलेगा? खेत में उत्पादन घटेगा, लागत बढ़ेगी और अंत में किसान ही आर्थिक नुकसान उठाएगा।

सबसे दुखद बात यह है कि ऐसे मामले कोई नई बात नहीं हैं। लगभग हर साल देश के अलग-अलग राज्यों से नकली या घटिया गुणवत्ता वाले बीज, खाद और कीटनाशकों की खबरें सामने आती हैं। कभी बीज अंकुरित नहीं होता। कभी कीटनाशक छिड़कने के बाद भी कीट नहीं मरते। कभी खाद में पोषक तत्व कम निकलते हैं।

हर बार कुछ नमूने लिए जाते हैं, कुछ लाइसेंस निलंबित होते हैं, कुछ एफआईआर दर्ज होती हैं और कुछ गोदाम सील कर दिए जाते हैं। लेकिन अगले सीजन में फिर वही खबरें सामने आने लगती हैं। यही कारण है कि किसान यह सवाल पूछने लगा है कि आखिर ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों होती हैं? यदि नियम इतने मजबूत हैं, निरीक्षण व्यवस्था इतनी सक्रिय है और गुणवत्ता जांच की पूरी व्यवस्था मौजूद है, तो फिर नकली या घटिया उत्पाद बाजार तक पहुंच कैसे जाते हैं?

किसान की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि वह प्रयोगशाला लेकर खेत में नहीं जाता। वह पैकेट पर लिखी जानकारी और कंपनी के दावे पर भरोसा करता है। उसे यह उम्मीद रहती है कि सरकार द्वारा लाइसेंस प्राप्त कंपनी या विक्रेता उसे गुणवत्तापूर्ण उत्पाद ही देगा। लेकिन जब यही भरोसा टूटता है, तब किसान केवल आर्थिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी टूट जाता है।

खेती का पूरा विज्ञान संतुलित पोषण पर आधारित है। यदि किसान पोटाश की कमी पूरी करने के लिए उर्वरक डाल रहा है और उसमें पोटाश ही नहीं है, तो फसल में पोटाश की कमी बनी रहेगी। परिणामस्वरूप पौधों की बढ़वार प्रभावित होगी, रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है, दाना भरने की क्षमता कम हो सकती है और उत्पादन घट सकता है।

बाद में किसान समझ ही नहीं पाता कि नुकसान आखिर हुआ किस वजह से। इसी प्रकार यदि बीज नकली निकल जाए तो किसान दोबारा बोनी नहीं कर पाता। समय निकल जाता है। यदि कीटनाशक नकली निकल जाए तो कीट पूरी फसल को चट कर जाते हैं। यदि उर्वरक नकली निकल जाए तो फसल पूरे मौसम कमजोर बनी रहती है।

यानी कृषि आदानों की गुणवत्ता सीधे किसान की आय से जुड़ी हुई है। कई बार जांच तब शुरू होती है जब फसल खराब हो चुकी होती है। नमूने लिए जाते हैं, रिपोर्ट आती है, फिर कार्रवाई होती है। लेकिन तब तक किसान का नुकसान हो चुका होता है। जिस किसान की पूरी साल की कमाई खेत में खत्म हो गई, उसके लिए बाद में हुई कार्रवाई का क्या महत्व रह जाता है? उसका समय वापस नहीं आता, उसकी मेहनत वापस नहीं आती और उसकी फसल भी वापस नहीं आती।

नकली और घटिया कृषि आदानों पर रोक लगाने के उपाय

इसलिए आवश्यकता केवल कार्रवाई की नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिससे घटिया या नकली उत्पाद बाजार तक पहुंच ही न सकें। उत्पादन इकाइयों पर नियमित निगरानी हो। गोदामों की समय-समय पर जांच हो। बाजार से रैंडम सैंपल लिए जाएं। गुणवत्ता परीक्षण की प्रक्रिया तेज और पारदर्शी हो। दोषी पाए जाने पर केवल लाइसेंस निलंबित करने तक बात सीमित न रहे बल्कि कानून के अनुसार प्रभावी कार्रवाई हो ताकि भविष्य में कोई भी किसान के साथ ऐसा करने की हिम्मत न करे।

डिजिटल पोर्टल और QR कोड ट्रेसबिलिटी (Traceability) व्यवस्था

आज तकनीक का दौर है। जिस तरह खाद वितरण में डिजिटल पोर्टल बनाए गए हैं, उसी तरह कृषि आदानों की ट्रेसबिलिटी भी मजबूत की जा सकती है। प्रत्येक बैच का डिजिटल रिकॉर्ड हो। किसान QR कोड स्कैन करके उत्पाद की जानकारी देख सके। यदि किसी बैच में गड़बड़ी मिले तो तुरंत पूरे राज्य में उसका अलर्ट जारी हो सके। इससे नकली और घटिया उत्पादों की पहचान आसान होगी।

अधिकृत विक्रेताओं से खरीदारी और पक्का बिल की अनिवार्यता

साथ ही कृषि विभाग को किसानों के बीच जागरूकता अभियान भी चलाने चाहिए। किसानों को बताया जाए कि हमेशा अधिकृत विक्रेता से ही खरीदारी करें। बिल अवश्य लें। बिना बिल के खरीदे गए उत्पाद पर बाद में शिकायत करना कठिन हो सकता है। पैकेट पर बैच नंबर, निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि और निर्माता का नाम अवश्य जांचें। यदि किसी उत्पाद के उपयोग के बाद असामान्य परिणाम दिखाई दें, तो उसका पैकेट और बिल सुरक्षित रखें तथा तत्काल कृषि विभाग को सूचना दें।

कई बार किसान सस्ते दाम के लालच में बिना लाइसेंस वाले विक्रेताओं से उत्पाद खरीद लेते हैं। इससे जोखिम और बढ़ जाता है। इसलिए थोड़ी सी सावधानी भविष्य के बड़े नुकसान से बचा सकती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी जिम्मेदारी किसान पर डाल दी जाए। गुणवत्ता सुनिश्चित करना निर्माता, विक्रेता और नियामक संस्थाओं की भी समान जिम्मेदारी है।

कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसान उस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि किसान को ही गुणवत्तापूर्ण बीज, खाद और कीटनाशक नहीं मिलेंगे, तो उत्पादन कैसे बढ़ेगा? सरकारें उत्पादन बढ़ाने, आय दोगुनी करने और आधुनिक खेती की बात करती हैं, लेकिन इन सभी प्रयासों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि किसान तक सही गुणवत्ता वाले कृषि आदान पहुंचें।

किसानों का भरोसा तभी मजबूत होगा जब उन्हें यह विश्वास होगा कि बाजार में बिकने वाला हर बीज, हर उर्वरक और हर कीटनाशक निर्धारित मानकों के अनुरूप है। यदि किसी उत्पाद में गड़बड़ी मिलती है, तो जांच तेज हो, कार्रवाई पारदर्शी हो और दोषियों को ऐसा दंड मिले जो भविष्य में दूसरों के लिए भी उदाहरण बने।

पीड़ित किसानों के लिए त्वरित मुआवजा और शिकायत निवारण

यह भी जरूरी है कि जिन किसानों को घटिया गुणवत्ता वाले कृषि आदानों के कारण नुकसान हुआ है, उनकी शिकायतों का समयबद्ध समाधान हो। यदि जांच में उत्पाद दोषपूर्ण पाया जाता है और नियमों के अनुसार किसान को राहत या मुआवजे का प्रावधान है, तो वह प्रक्रिया भी तेजी से पूरी होनी चाहिए। किसान को वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।

किसान का सबसे बड़ा निवेश उसका विश्वास है। जब वह दुकान से खाद, बीज या दवा खरीदता है, तो उसे भरोसा होता है कि यह उत्पाद उसकी फसल को बेहतर बनाएगा। यदि यही भरोसा टूटने लगे, तो कृषि व्यवस्था की सबसे मजबूत नींव कमजोर हो जाती है।देश का अन्नदाता केवल इतना चाहता है कि उसे उसकी मेहनत के बदले ईमानदारी मिले। वह गुणवत्ता वाला बीज खरीदे तो अंकुरण अच्छा हो। कीटनाशक खरीदे तो कीट नियंत्रित हों। उर्वरक खरीदे तो उसमें वही पोषक तत्व हों जो बोरी पर लिखे गए हैं।

यह कोई अतिरिक्त मांग नहीं बल्कि किसान का मूल अधिकार है। आज जरूरत इस बात की है कि नकली और घटिया कृषि आदानों के खिलाफ शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति अपनाई जाए। गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत हो, निरीक्षण नियमित हो, जांच तेज हो और दोषियों पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित हो।

तभी किसान का भरोसा मजबूत होगा और कृषि व्यवस्था वास्तव में सशक्त बन सकेगी। क्योंकि किसान की मेहनत केवल उसकी रोजी-रोटी नहीं है, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा की नींव है। यदि किसान सुरक्षित रहेगा, तभी खेती सुरक्षित रहेगी और तभी देश का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

निष्कर्ष: कृषि क्षेत्र में खाद, बीज और कीटनाशकों के नाम पर होने वाली मिलावट और धोखाधड़ी को रोकने के लिए अब शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति अपनाने का समय आ चुका है। बोरी पर 60% पोटाश लिखकर अंदर 0% माल बेचना किसानों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है।

इस समस्या के स्थाई समाधान के लिए कड़े नियमों के साथ-साथ डिजिटल ट्रेसबिलिटी (QR कोड) को लागू करना होगा। किसान भाइयों को भी चाहिए कि वे सस्ते के लालच में न पड़कर हमेशा लाइसेंसधारी दुकानों से पक्का बिल लेकर ही खरीदारी करें। जब देश का अन्नदाता जागरूक होगा और नियामक संस्थाएं सख्त होंगी, तभी हमारी कृषि व्यवस्था वास्तव में सुरक्षित और मजबूत बन सकेगी।

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