क्या आप भी इस बात से परेशान हैं कि खेत में भरपूर पानी और महंगी खाद डालने के बाद भी फसल कमजोर रह जाती है और मिट्टी की ऊपरी सतह पर नमक जैसी सफेद या राख जैसी सख्त परत जम जाती है? अगर हां, तो आज की ये पोस्ट आपके खेत की तकदीर और आपकी खेती की तस्वीर दोनों बदल सकती है।
किसानों के लिए एक बहुत ही गंभीर और खेती से जुड़ी हुई सबसे बड़ी परेशानी बता रहा हूँ। हम सब दिन रात मिट्टी से सोना उगाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हम बीज भी सबसे अच्छा लाते हैं, पानी भी समय पर देते हैं, लेकिन किसानों की जमीन साथ नहीं देती। खेत के कुछ हिस्सों में बीज जमता ही नहीं है या पौधे पीले पड़कर सूख जाते हैं।
हमारी भाषा में इसे ऊसर, कल्लर या रेह वाली जमीन कहते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे लवणीय और क्षारीय मृदा कहा जाता है। आज मैं आपको बिल्कुल सीधी और सरल भाषा में बताऊंगा कि यह परेशानी क्या है और हम कैसे बहुत ही आसान तरीकों से अपनी इस खराब होती जमीन को वापस उपजाऊ बना सकते हैं।
किसानों के लिए यह परेशानी सिर्फ मेरे या आपके अकेले के खेत की नहीं है। हमारे भारत में लगभग 6.7 मिलियन हैक्टर क्षेत्र लवणीय एवं क्षारीय मृदा के रूप में चिन्हित हो चुका है । यह कोई छोटी जगह नहीं है। यह खराब मिट्टी हमारे राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा समुद्री किनारे वाले सभी राज्यों में बहुत बड़े पैमाने पर पायी जाती है।
इन इलाकों में जमीन के अंदर नमक की मात्रा इतनी ज्यादा हो गई है कि हमें मजबूरी में सिर्फ कुछ ही तरह की फसलें उगानी पड़ती हैं और हमारी मेहनत का पूरा फल हमें नहीं मिल पाता है। खराब जमीन मुख्य रूप से दो तरह की होती है। पहली होती है लवणीय मृदा, जिसमें सफेद नमक ऊपर आ जाता है।
इस मिट्टी का पी-एच मान 8.5 से कम होता है लेकिन इसमें घुले हुए नमक की मात्रा बहुत ज्यादा होती है । दूसरी होती है क्षारीय मृदा, जो बहुत ज्यादा सख्त हो जाती है। अधिक नमक की सान्द्रता के कारण क्षारीय मृदा का पी-एच मान 8.5 से अधिक हो जाता है।
इस क्षारीय मिट्टी में सोडियम की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, जिससे मिट्टी की संरचना बिल्कुल कमजोर हो जाती है और जमीन में हवा और पानी के आने-जाने का रास्ता बंद हो जाता है। इसके अलावा एक तीसरी तरह की जमीन भी होती है जिसमें लवणीय और क्षारीय दोनों तरह की मिट्टी के लक्षण पाए जाते हैं ।
जब हमारी जमीन में यह खारापन या नमक बढ़ जाता है, तो हमारी फसल पर इसका बहुत ही भयंकर असर पड़ता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि मिट्टी में नमक की सान्द्रता अधिक होने के कारण, खेत में पानी होने के बावजूद पौधों की जड़ें उस पानी को नहीं सोख पाती हैं। पौधे प्यासे ही रह जाते हैं। जड़ तन्त्र द्वारा पोषक तत्वों का ग्रहण भी बहुत कम हो जाता है।
पौधों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं या फिर पूरी तरह से मर जाती हैं । इसके कारण हमें खेत में बार-बार सिंचाई करनी पड़ती है और पानी की आवश्यकता अधिक होती है। इन सबका सीधा असर यह होता है कि हमारी फसल की पैदावार तो गिरती ही है, साथ ही फसल की गुणवत्ता में भी भारी कमी आ जाती है ।
लेकिन किसानों को निराश होने की जरूरत नहीं है। हमारे कृषि वैज्ञानिकों ने इसके बहुत ही पक्के और सस्ते उपाय खोज निकाले हैं। लवणीय और क्षारीय जमीन को सुधारने के लिए दो सबसे बेहतरीन और काम के तरीके हैं लीचिंग और जिप्सम का प्रयोग। वैज्ञानिक आधार पर इन मृदा के प्रबंधन के लिए लीचिंग एवं जिप्सम का उपयोग बहुत ही फायदेमंद है।
सबसे पहले बात करते हैं लीचिंग की, जिसे हम अपनी भाषा में मिट्टी की धुलाई करना कह सकते हैं। यह तरीका सफेद नमक वाली यानी लवणीय जमीन के लिए सबसे अच्छा है। लीचिंग की प्रक्रिया में हम खेत में मेड़बंदी करके उसमें अच्छी गुणवत्ता वाला साफ पानी भर देते हैं। बारिश का पानी भी लीचिंग के रूप में बहुत अच्छे से प्रयोग किया जाता है।
जब साफ पानी खेत में भरा रहता है, तो मिट्टी का सारा फालतू नमक पानी में घुल जाता है। इसके बाद यह घुला हुआ नमक पानी के साथ रिसकर जमीन की निचली सतह में गहराई तक चला जाता है, जहां हमारे पौधों की जड़ें नहीं पहुंचती हैं। ऐसा करने से ऊपर की मिट्टी साफ हो जाती है। लीचिंग कितनी अच्छी होगी, यह कई बातों पर निर्भर करता है।
अगर हमारी मिट्टी की संरचना अच्छी होगी या मिट्टी में रेत ज्यादा होगी, तो नमक बहुत आसानी से पानी के साथ नीचे चला जाएगा। इसके अलावा जो पानी हम खेत में भर रहे हैं, वह साफ होना चाहिए। एक सबसे जरूरी बात यह है कि अगर हम खेत में देसी खाद या कार्बनिक पदार्थ डालते हैं, तो लीचिंग का काम और भी बेहतर हो जाता है।
मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाने से लीचिंग की दक्षता में बढ़ोतरी होती है। कार्बन मिट्टी को भुरभुरा बनाता है और जल रन्ध्रता की संख्या को बढ़ाता है, जिससे पानी और नमक आसानी से नीचे चले जाते हैं। मौसम का भी असर होता है, यदि तापमान कम होगा तो लीचिंग ज्यादा अच्छी होगी। अब बात करते हैं क्षारीय जमीन की, जो काली और बहुत सख्त होती है।
इस जमीन में सोडियम नाम का तत्व बहुत ज्यादा होता है। क्षारीय मृदा के सुधार के लिए जिप्सम का प्रयोग सबसे ज्यादा प्रभावी है।जिप्सम एक बहुत ही सस्ता और बाजार में आसानी से मिलने वाला भूमि सुधारक है। जब हम खेत में जिप्सम डालते हैं, तो यह मिट्टी में से खतरनाक सोडियम को हटा देता है और मिट्टी को मुलायम और उपजाऊ बना देता है।
खेत में कितनी जिप्सम डालनी है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि मिट्टी में सोडियम का स्तर कितना ज्यादा है। इसके अलावा मिट्टी में कार्बन की मात्रा और मिट्टी के कणों का प्रकार भी जिप्सम की मात्रा को तय करते हैं।
अगर आपके खेत की मिट्टी में नमक भी ज्यादा है और मिट्टी सख्त भी हो गई है (यानी वह लवणीय और क्षारीय दोनों है), तो आपको अच्छी फसल उत्पादन के लिए लीचिंग के साथ-साथ जिप्सम का भी प्रयोग करना होगा। इन तरीकों को अपनाकर यह अतिरिक्त नमक जड़-तन्त्र से निचली मृदा परतों में एकत्रित हो जाता है जो पौधों के लिए अनुपयोगी होती है।
किसान भाइयों आने वाले समय में दुनिया की आबादी बढ़ने वाली है और हमें इसी जमीन से ज्यादा अनाज भी पैदा करना होगा। वर्ष 2050 तक हमें कई लाखों टन अधिक अनाज की जरूरत होगी। इसके लिए हमें अपनी खराब पड़ी जमीनों को वापस सुधारना ही होगा। मिट्टी की जांच करवाएं और जरूरत के हिसाब से खेत में जिप्सम डालें और पानी भरकर उसकी धुलाई करें।
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मेरा नाम Anil Kumar Prasad है। मैं एक प्रगतिशील किसान हूं और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने निजी अनुभव और खेती की सटीक जानकारी साझा करता हूं। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
