खाद सब्सिडी में बढ़ोतरी: क्या ₹1350 में DAP मिलती रहेगी, जानें खेती की बढ़ती लागत से बचने का फॉर्मूला!

किसानों के लिए हाल ही में सरकार द्वारा गैर-यूरिया (Non Urea) उर्वरकों पर सब्सिडी बढ़ाने का जो फैसला लिया गया है, उसका सीधा असर हम जैसे किसानों की खेती की लागत और मुनाफे पर पड़ने वाला है। आज के समय में खेती पहले से ही कई चुनौतियों से घिरी हुई है- कभी मौसम की मार, कभी कीटों का प्रकोप, तो कभी खाद-बीज की बढ़ती कीमतें।

ऐसे में यह फैसला एक राहत भी है और एक चेतावनी भी, जिसे हमें समझना बहुत जरूरी है। सबसे पहले समझते हैं कि यह सब्सिडी बढ़ाई क्यों गई। पिछले कुछ समय से पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रहे तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं।

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगाता है- चाहे वह DAP हो, पोटाश हो या फिर यूरिया बनाने के लिए जरूरी गैस। जब बाहर कीमत बढ़ती है, तो उसका असर सीधे हमारे देश की खेती पर पड़ता है। यही कारण है कि सरकार ने खरीफ 2026 के लिए 10% से 21% तक सब्सिडी बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि किसानों को महंगी खाद का बोझ कम झेलना पड़े।

एक किसान के नजरिए से देखें तो यह फैसला हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर सरकार सब्सिडी नहीं बढ़ाती, तो DAP और अन्य खाद की कीमतें काफी ज्यादा हो जाती। अभी सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि DAP की 50 किलो की बोरी लगभग ₹1350 के आसपास ही मिलती रहे। इसका मतलब यह है कि बाजार में कीमत बढ़ने के बावजूद हमें तुरंत ज्यादा पैसे नहीं देने पड़ेंगे।

लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है। असल चिंता की बात यह है कि भारत की उर्वरक व्यवस्था अभी भी काफी हद तक विदेशों पर निर्भर है। लगभग 30% DAP और बड़ी मात्रा में कच्चा माल जैसे फॉस्फेट और गैस बाहर से आता है। यहां तक कि यूरिया बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली गैस का लगभग 85% हिस्सा भी आयात किया जाता है।

इसका सीधा मतलब है कि अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई भी संकट आता है- जैसे युद्ध, सप्लाई रुकना या कीमतों में उछाल तो उसका असर हमारी खेती पर जरूर पड़ेगा। एक किसान के रूप में हमें यह समझना होगा कि केवल सरकार की सब्सिडी पर निर्भर रहना लंबे समय में सुरक्षित नहीं है।

आज सरकार ₹41,000 करोड़ से ज्यादा खर्च करके हमें राहत दे रही है, लेकिन अगर आने वाले समय में कीमतें और बढ़ती हैं, तो यह बोझ सरकार के लिए भी संभालना मुश्किल हो सकता है। इसका असर भविष्य में या तो कीमतों के बढ़ने के रूप में दिखेगा या सब्सिडी कम होने के रूप में।

अब सवाल यह है कि इस स्थिति में किसान क्या करें? सबसे पहले हमें अपने खेत में उर्वरकों का संतुलित उपयोग करना सीखना होगा। आज भी कई किसान बिना मिट्टी की जांच कराए ही DAP, यूरिया और पोटाश का इस्तेमाल अंधाधुन करते हैं। इससे ना केवल खर्च बढ़ता है, बल्कि मिट्टी की सेहत भी खराब होती है।

अगर हम Soil Testing के आधार पर खाद डालें, तो कम मात्रा में भी बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है- जैविक और प्राकृतिक विकल्पों को अपनाना। आज कई शोध यह साबित कर चुके हैं कि अगर हम गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, ट्राइकोडर्मा, समुद्री शैवाल, माइक्रोराइजा और अन्य बायो-फर्टिलाइज़र का उपयोग करें, तो रासायनिक खाद पर हमारी निर्भरता काफी कम हो सकती है। इससे मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है और लंबे समय में लागत भी कम होती है।

तीसरी बात जो हमें ध्यान में रखनी चाहिए, वह है Integrated Nutrient Management (INM)। इसका मतलब है कि हम रासायनिक खाद, जैविक खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित मिश्रण उपयोग करें। इससे पौधे को सभी जरूरी तत्व मिलते हैं और उत्पादन भी अच्छा होता है। केवल एक ही खाद पर निर्भर रहना हमेशा नुकसानदायक साबित होता है।

इसके अलावा हमें यह भी समझना होगा कि उर्वरकों का सही समय पर उपयोग भी बहुत जरूरी है। कई बार किसान एक साथ ज्यादा मात्रा में खाद डाल देते हैं, जिससे उसका पूरा लाभ पौधे को नहीं मिल पाता। अगर हम फसल के अलग-अलग चरणों में जरूरत के अनुसार खाद दें, तो कम मात्रा में भी बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

इस पूरे मामले में एक और बड़ी सीख यह है कि हमें खेती को धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बनाना होगा। जैसे हम बीज उत्पादन, जैविक खाद निर्माण और प्राकृतिक कीटनाशकों की ओर बढ़ रहे हैं, उसी तरह उर्वरकों के मामले में भी हमें विकल्प खोजने होंगे। गांव स्तर पर कम्पोस्ट यूनिट, गोबर गैस प्लांट और जैविक इनपुट तैयार करना अब समय की जरूरत बन चुका है।

सरकार का यह फैसला निश्चित रूप से किसानों को तात्कालिक राहत देता है, खासकर खरीफ सीजन में जब खाद की मांग सबसे ज्यादा होती है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह एक अस्थायी समाधान है। असली समाधान तभी होगा जब हम अपनी खेती को कम लागत, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाएंगे।

किसानों के लिए यही संदेश है कि बदलते समय के साथ हमें भी अपनी सोच और तरीके बदलने होंगे। केवल सब्सिडी पर निर्भर रहकर खेती करना अब सुरक्षित नहीं है। हमें वैज्ञानिक खेती, संतुलित पोषण और जैविक विकल्पों को अपनाकर अपने खेत और भविष्य दोनों को सुरक्षित बनाना होगा। तभी हम बढ़ती लागत और वैश्विक संकटों के बावजूद अच्छी आमदनी और स्थिर खेती कर पाएंगे।

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