खरीफ 2026 से पहले किसानों को बड़ा झटका, खाद-बीज के दाम पहुंचे रिकॉर्ड स्तर पर

खरीफ सीजन 2026 की शुरुआत से पहले किसानों को एक और बड़ा झटका लगा है। मध्य प्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ (मार्कफेड) द्वारा जारी नई उर्वरक दरों के अनुसार 1 जून से डीएपी और यूरिया की कीमतें भले स्थिर रखी गई हों, लेकिन एनपीके और पोटाश जैसे प्रमुख उर्वरकों के दामों में भारी बढ़ोतरी कर दी गई है।

इसका सीधा असर खेती की लागत पर पड़ने वाला है। ऐसे समय में जब किसान पहले से मौसम की अनिश्चितता, फसलों के घटते दाम और बढ़ते कृषि खर्चों से जूझ रहा है, तब खाद की कीमतों में यह बढ़ोतरी उसकी चिंता को और बढ़ाने वाली है। कृषि विशेषज्ञ लगातार संतुलित पोषण की बात करते हैं।

किसानों को सलाह दी जाती है कि वे केवल यूरिया और डीएपी पर निर्भर न रहें बल्कि पोटाश, सल्फर और एनपीके जैसे उर्वरकों का भी उपयोग करें ताकि मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहे और फसलों को सभी आवश्यक पोषक तत्व मिल सकें। लेकिन जब इन्हीं उर्वरकों की कीमतें अचानक 400 से 800 रुपए प्रति बैग तक बढ़ जाएं, तब किसान के सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि वह संतुलित पोषण अपनाए या खेती की लागत कम करने के लिए उर्वरकों का उपयोग घटा दे।

सबसे अधिक चर्चा एनपीके 12:32:16 की कीमत को लेकर हो रही है। जून 2025 में यही खाद लगभग 1775 रुपए प्रति बैग मिल रही थी। कुछ माह पहले इसकी कीमत 1900 रुपए तक पहुंची और अब इसकी नई दर 2450 रुपए प्रति बैग घोषित की गई है। यानी एक साल में लगभग 675 रुपए प्रति बैग की वृद्धि। यह बढ़ोतरी मामूली नहीं कही जा सकती।

यदि कोई किसान खरीफ सीजन में 10 बैग एनपीके का उपयोग करता है तो केवल इसी एक उर्वरक पर उसका खर्च 6 से 7 हजार रुपए तक बढ़ जाएगा। इसी प्रकार एनपीके 16:16:16 की कीमत भी 1600 रुपए से बढ़कर 2050 रुपए प्रति बैग पहुंच गई है। एनपीके 19:19:19 का भाव तो 1600 रुपए से बढ़कर सीधे 2400 रुपए तक पहुंच गया है। 24:24:24 ग्रेड का उर्वरक भी 1900 रुपए से बढ़कर 2300 रुपए प्रति बैग हो गया है।

पोटाश की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। पिछले वर्ष जहां पोटाश 1500 रुपए प्रति बैग के आसपास उपलब्ध थी, वहीं अब इसकी नई कीमत 1975 रुपए प्रति बैग घोषित की गई है। किसानों की समस्या केवल खाद तक सीमित नहीं है। इसी समय बीजों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है।

सोयाबीन, मक्का, धान, कपास और अन्य खरीफ फसलों के प्रमाणित बीजों के दाम पहले की तुलना में काफी बढ़ चुके हैं। कई संकर बीजों की कीमतें 10 हजार रुपए प्रति क्विंटल या उससे भी अधिक हो चुकी हैं। ऐसे में जब बीज और खाद दोनों महंगे हो जाएं तो खेती की कुल लागत में हजारों नहीं बल्कि कई बार प्रति एकड़ दसियों हजार रुपए तक की वृद्धि हो जाती है।

एक औसत किसान की स्थिति को समझना जरूरी है। मान लीजिए किसी किसान के पास 10 एकड़ भूमि है और वह सोयाबीन, मक्का या अन्य खरीफ फसलें बोने जा रहा है। उसे बुवाई से पहले खेत की तैयारी, बीज, उर्वरक, मजदूरी, डीजल, सिंचाई और कीटनाशकों पर खर्च करना पड़ता है।

यदि केवल उर्वरकों की लागत ही 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाए तो उसकी कुल कृषि लागत में भारी वृद्धि होना स्वाभाविक है। लेकिन समस्या यह है कि फसल बेचते समय किसान को उसकी उपज का मूल्य उसी अनुपात में नहीं मिलता। कृषि अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि यदि उत्पादन लागत तेजी से बढ़े और उत्पाद का बाजार मूल्य स्थिर रहे तो उत्पादक की आय कम हो जाती है। वर्तमान समय में किसानों के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

खाद, बीज, डीजल और मजदूरी लगातार महंगे हो रहे हैं, लेकिन अधिकांश फसलों के बाजार भाव उसी गति से नहीं बढ़ रहे। इसका परिणाम यह होता है कि किसान का लाभ घटता जाता है और कई बार वह घाटे की स्थिति में पहुंच जाता है। हालांकि सरकार और कृषि विभाग का दावा है कि जिले में उर्वरकों का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।

अधिकारियों के अनुसार यूरिया, डीएपी और एनपीके सहित हजारों मीट्रिक टन खाद विभिन्न गोदामों और सहकारी समितियों में मौजूद है। खाद की उपलब्धता निश्चित रूप से राहत की बात है, क्योंकि कई बार किसानों को कीमतों के साथ-साथ कमी की समस्या का भी सामना करना पड़ता है।

लेकिन केवल उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। किसानों के लिए यह भी जरूरी है कि खाद उचित कीमत पर उपलब्ध हो और उसकी खरीद प्रक्रिया सरल हो। वर्तमान समय में किसानों को फार्मर आईडी और ई-विकास प्रणाली के माध्यम से उर्वरक बुक करने की सलाह दी जा रही है। डिजिटल व्यवस्था पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से लागू की जा रही है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कई किसानों को तकनीकी प्रक्रियाओं में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

इसलिए सरकार और कृषि विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी किसान केवल तकनीकी कारणों से खाद प्राप्त करने से वंचित न रहे। एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या महंगे उर्वरकों के कारण किसान संतुलित पोषण की अवधारणा से दूर हो जाएंगे? कई बार देखा गया है कि जब पोटाश या एनपीके महंगी होती है तो किसान लागत बचाने के लिए केवल यूरिया और डीएपी का उपयोग बढ़ा देते हैं।

इससे फसल को आवश्यक सभी पोषक तत्व नहीं मिल पाते और मिट्टी का पोषण संतुलन भी बिगड़ जाता है। लंबे समय में यह मिट्टी की उर्वरा शक्ति को नुकसान पहुंचा सकता है और उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए प्रोत्साहित करना है तो सरकार को पोषक तत्व आधारित सब्सिडी व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए।

केवल नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों को सस्ता और अन्य उर्वरकों को महंगा छोड़ देने से संतुलित पोषण का लक्ष्य प्राप्त करना कठिन हो जाता है। किसानों को ऐसे विकल्प उपलब्ध कराने होंगे जिससे वे अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार सभी आवश्यक पोषक तत्वों का उपयोग कर सकें। खरीफ सीजन 2026 की शुरुआत ऐसे समय में हो रही है जब मौसम को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।

कई क्षेत्रों में मानसून के सामान्य से कम रहने की आशंका व्यक्त की जा रही है। यदि वर्षा सामान्य नहीं रहती और दूसरी ओर खेती की लागत भी बढ़ती है, तो किसानों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो सकती है। इसलिए कृषि नीति बनाते समय केवल उर्वरकों की उपलब्धता ही नहीं बल्कि उनकी कीमतों और किसानों की भुगतान क्षमता पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

हम किसानों की अपेक्षा बहुत सरल है। वे चाहते हैं कि उन्हें समय पर खाद मिले, उचित मूल्य पर मिले और खेती की लागत इतनी न बढ़े कि फसल उत्पादन आर्थिक रूप से अलाभकारी हो जाए। यदि खेती की लागत लगातार बढ़ती रही और उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिला, तो इसका असर केवल किसानों पर ही नहीं बल्कि पूरे कृषि क्षेत्र और खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

खाद की नई दरों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि खेती को लाभकारी बनाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाने की बात पर्याप्त नहीं है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए लागत नियंत्रण भी उतना ही जरूरी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार बढ़ती कृषि लागत को कम करने के लिए क्या कदम उठाती है और किसानों को किस प्रकार की राहत उपलब्ध कराती है।

फिलहाल इतना तय है कि खरीफ सीजन 2026 में किसानों को अपनी जेब पहले से अधिक ढीली करनी पड़ेगी। महंगे बीज, महंगे उर्वरक और अनिश्चित मौसम के बीच किसान फिर एक नई उम्मीद के साथ खेतों की ओर बढ़ रहा है। देश की खाद्य सुरक्षा का भार आज भी उसी किसान के कंधों पर है, जो हर चुनौती के बावजूद खेती करना नहीं छोड़ता।

निष्कर्ष: खरीफ सीजन 2026 की शुरुआत में ही एनपीके और पोटाश जैसे महत्वपूर्ण उर्वरकों के साथ-साथ बीजों के दामों में हुई भारी वृद्धि ने किसानों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। सरकार द्वारा खाद की पर्याप्त उपलब्धता और डिजिटल पारदर्शिता के दावे अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन बढ़ती उत्पादन लागत और फसलों के स्थिर बाजार भाव के बीच का यह असंतुलन अंततः किसान की शुद्ध आय को कम करता है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस आर्थिक बोझ के कारण किसान ‘संतुलित पोषण’ (Balanced Nutrition) की वैज्ञानिक सलाह को छोड़कर केवल सस्ते विकल्पों (यूरिया-डीएपी) की तरफ मजबूर हो सकता है, जिससे लंबे समय में मिट्टी की उपजाऊ क्षमता और देश की खाद्य सुरक्षा पर बुरा असर पड़ेगा।

अतः कृषि को व्यावहारिक रूप से लाभकारी बनाए रखने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाने या खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर ही नहीं, बल्कि इनपुट कॉस्ट (खेती की लागत) को नियंत्रित करने और पोषक तत्व आधारित सब्सिडी नीति की समीक्षा करने की तत्काल आवश्यकता है।

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