आम की फसल से अच्छा उत्पादन लेने के लिए केवल फल तुड़ाई तक मेहनत करना ही पर्याप्त नहीं होता। असली काम तो फल तोड़ने के बाद शुरू होता है। हमारे देश में अधिकांश बागवान एक बड़ी गलती करते हैं। जैसे ही आम की तुड़ाई पूरी होती है, वे बाग को लगभग अगले सीजन तक छोड़ देते हैं।
न कटाई-छंटाई होती है, न समय पर खाद दी जाती है और न ही रोग एवं कीटों का प्रबंधन किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि अगले वर्ष पेड़ों में बौर कम आता है, फलन अनियमित हो जाती है और धीरे-धीरे उत्पादन घटने लगता है। यदि फल तुड़ाई के तुरंत बाद वैज्ञानिक तरीके से बाग का प्रबंधन किया जाए, तो अगले वर्ष भरपूर बौर, स्वस्थ पेड़ और अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
आम के बाग में कटाई-छंटाई (Pruning) क्यों है जरूरी?
सबसे पहला काम है पूरे बाग का निरीक्षण करना। हर पेड़ को ध्यान से देखें और पहचान करें कि कौन-कौन सी टहनियां सूख चुकी हैं, किन शाखाओं पर रोग का प्रकोप है, कौन-सी शाखाएं एक-दूसरे से टकरा रही हैं और कौन-सी शाखाएं पेड़ के अंदर या नीचे की ओर बढ़ रही हैं। ऐसी सभी शाखाओं को बिना किसी संकोच के काट देना चाहिए।
सूखी, रोगग्रस्त और अंदर की ओर बढ़ने वाली शाखाएं कभी भी अच्छी फलधारी शाखाएं नहीं बनतीं। ये केवल पौधे का भोजन और ऊर्जा खर्च करती हैं। इसलिए इन्हें हटाने से पौधे का पोषण उन स्वस्थ शाखाओं तक पहुंचता है, जिन पर अगले वर्ष फूल और फल आने वाले होते हैं।
पुराने बौर के डंठल हटाना और कैनोपी संतुलन
फल तुड़ाई के बाद एक और महत्वपूर्ण कार्य है पुराने बौर के डंठलों को हटाना। जिन स्थानों पर फल लगे थे, वहां अक्सर बौर के सूखे डंठल लगे रह जाते हैं। इन्हें भी काटकर हटा देना चाहिए। इससे नई शाखाओं के निकलने में सुविधा होती है और रोगों के फैलने की संभावना कम हो जाती है। इसके साथ ही पेड़ की कैनोपी (Canopy) को संतुलित करना भी आवश्यक है।
सामान्यतः पेड़ के कुल हरे भाग का लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा हल्की प्रूनिंग द्वारा कम कर देना चाहिए। इससे पौधे का अनावश्यक भार कम होता है और नई स्वस्थ शाखाओं का विकास तेजी से होता है। प्रूनिंग करते समय यह ध्यान रखें कि पेड़ के बीच वाले हिस्से में पर्याप्त धूप और हवा पहुंचनी चाहिए।
यदि कैनोपी बहुत घनी होगी तो अंदर की शाखाओं पर न तो अच्छी रोशनी पहुंचेगी और न ही वायु संचार होगा। ऐसी स्थिति में एन्थ्रेक्नोज, रेड रस्ट, डाइबैक और अन्य फफूंदजनित रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए पेड़ को इस प्रकार आकार दें कि हर शाखा तक धूप पहुंचे और हवा आसानी से गुजर सके।
प्रूनिंग के बाद फफूंद और रोगों से सुरक्षा के उपाय
कटाई-छंटाई के बाद रोगों से सुरक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है। बरसात के मौसम में कटे हुए भागों से फफूंद आसानी से प्रवेश कर जाती है। इसलिए प्रूनिंग पूरी होने के तुरंत बाद पूरे पेड़ पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव करना चाहिए। इसकी अनुशंसित मात्रा 3 ग्राम प्रति लीटर पानी है। यदि बड़े कट लगे हों तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का गाढ़ा लेप कटे हुए भाग पर लगाया जा सकता है। इससे फफूंद का संक्रमण नहीं होता और घाव जल्दी भर जाता है।
यदि रेड रस्ट (लाल जंग) की समस्या दिखाई दे रही हो तो भी कॉपर आधारित फफूंदनाशक का प्रयोग लाभकारी रहता है। फल तुड़ाई के बाद पौधे को नई वृद्धि (Vegetative Growth) की आवश्यकता होती है। इसी समय निकलने वाली नई शाखाएं अगले वर्ष फूल देने वाली शाखाएं बनती हैं। इसलिए इस समय नाइट्रोजन की आवश्यकता सबसे अधिक होती है।
जुलाई-अगस्त के दौरान पर्याप्त नाइट्रोजन मिलने पर नई कोपलें निकलती हैं, जो दिसंबर-जनवरी तक परिपक्व होकर अगले मौसम में बौर देती हैं। यदि इस समय पौधे को पोषण नहीं मिलेगा तो नई शाखाएं कमजोर रहेंगी और अगले वर्ष उत्पादन भी कम होगा।
आम के पौधों के लिए संतुलित खाद और उर्वरक प्रबंधन
खाद प्रबंधन में सबसे पहले जैविक खाद पर ध्यान देना चाहिए। प्रत्येक बड़े फलदार पेड़ में 50 किलोग्राम 12 माह पुरानी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या वार्मी कम्पोस्ट वर्षा ऋतु में अवश्य डालनी चाहिए। यह मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाती है, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाती है और रासायनिक उर्वरकों की उपयोगिता भी बढ़ाती है। केवल यूरिया, डीएपी और पोटाश देने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते जब तक मिट्टी में पर्याप्त ऑर्गेनिक मैटर न हो।
फल तुड़ाई के तुरंत बाद नाइट्रोजन की पहली खुराक देना भी आवश्यक है। 10 वर्ष या उससे अधिक आयु के एक स्वस्थ आम के पेड़ के लिए वर्षभर की अनुशंसित मात्रा लगभग 3 किलोग्राम यूरिया, 2.25 किलोग्राम डीएपी तथा 3 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) मानी जाती है। इस पूरी मात्रा का आधा भाग सितंबर के अंत तक देना चाहिए और शेष आधा भाग फरवरी में फल मटर के दाने के आकार का होने पर देना चाहिए।
सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) देने का सही वैज्ञानिक तरीका
सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक बड़े पेड़ के लिए प्रति वर्ष लगभग 250 ग्राम जिंक सल्फेट, 250 ग्राम कॉपर सल्फेट, 250 ग्राम बोरेक्स तथा 150 ग्राम बुझा हुआ चूना दिया जा सकता है। इन सूक्ष्म पोषक तत्वों को कभी भी सीधे तने के पास नहीं डालना चाहिए। इन्हें पेड़ की कैनोपी के किनारे, जहां सक्रिय जड़ें होती हैं, वहां 8 से 12 इंच गहरी नाली बनाकर मिट्टी में मिलाना चाहिए और बाद में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए।
यह समझना भी बहुत जरूरी है कि पेड़ भोजन तने से नहीं बल्कि जड़ों के माध्यम से ग्रहण करता है। तना केवल भोजन पहुंचाने का माध्यम है। सक्रिय फीडिंग रूट्स (Feeding Roots) पेड़ की बाहरी कैनोपी के नीचे होती हैं। इसलिए खाद हमेशा तने से लगभग 1.5 से 2.5 मीटर दूरी पर गोलाई में नाली बनाकर डालनी चाहिए। यदि खाद सीधे तने के पास डाल दी जाए तो उसका अधिकांश भाग पौधे द्वारा उपयोग नहीं हो पाता।
बरसात के मौसम में खरपतवार भी तेजी से बढ़ते हैं। यदि इन्हें समय पर नियंत्रित नहीं किया गया तो यही खरपतवार खाद, पानी और पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा स्वयं उपयोग कर लेते हैं। इसलिए खाद डालने से पहले पेड़ के चारों ओर की खरपतवार साफ कर देनी चाहिए और बाद में सूखी घास या पत्तियों की मल्चिंग कर देनी चाहिए।
इससे नमी लंबे समय तक बनी रहती है और खरपतवार का विकास भी कम होता है। यदि बाग में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो खाद देने के बाद हल्की सिंचाई अवश्य करें। इससे उर्वरक जड़ों तक जल्दी पहुंचते हैं और उनका अवशोषण बेहतर होता है। ड्रिप सिंचाई वाले बागों में यह प्रक्रिया और भी अधिक प्रभावी रहती है।
रस चूसक कीटों और फफूंद जनित रोगों की निगरानी
फल तुड़ाई के बाद कीटों की निगरानी भी आवश्यक है। नई कोपलों पर आम की हॉपर, मिलीबग, थ्रिप्स तथा अन्य रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप बढ़ सकता है। यदि इनकी संख्या आर्थिक क्षति स्तर तक पहुंच जाए तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह अनुसार उचित कीटनाशक का प्रयोग करें। बिना आवश्यकता के बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव करने से बचें।
यदि बाग में किसी शाखा पर डाइबैक (Die Back), कैंकर या गंभीर फफूंद रोग दिखाई दे तो प्रभावित शाखा को स्वस्थ भाग से 15 से 20 सेंटीमीटर नीचे से काटकर तुरंत नष्ट कर दें और कटे हुए भाग पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप अवश्य लगाएं। इससे संक्रमण अन्य शाखाओं में नहीं फैलता। फल तुड़ाई के बाद किया गया यह पूरा प्रबंधन अगले वर्ष की फसल की नींव तैयार करता है।
यही वह समय है जब पौधा नई शाखाएं बनाता है, ऊर्जा संचित करता है और अगले सीजन की फलधारी कलियों का निर्माण करता है। यदि किसान इस समय केवल कुछ दिनों का समय निकालकर वैज्ञानिक तरीके से कटाई-छंटाई, रोग प्रबंधन, संतुलित पोषण, खरपतवार नियंत्रण और उचित सिंचाई कर दें, तो अगले वर्ष बौर अधिक आएगा, फलों की संख्या बढ़ेगी, गुणवत्ता बेहतर होगी और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिलेगी।
याद रखें, आम का बाग केवल फल तोड़ने से नहीं बल्कि पूरे वर्ष वैज्ञानिक प्रबंधन करने से लाभ देता है। जो किसान फल तुड़ाई के बाद पेड़ों की देखभाल पर ध्यान देते हैं, वही लंबे समय तक नियमित उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और अधिक मुनाफा प्राप्त करते हैं।
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