भारत में आम केवल स्वाद, सुगंध और संस्कृति का प्रतीक नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों, व्यापारियों और निर्यातकों की आजीविका का प्रमुख आधार है। लेकिन हाल के वर्षों में तुड़ाई के बाद तेजी से बढ़ रही एक गंभीर समस्या- डंठल सड़न रोग- आम उत्पादकों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
यह रोग विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा दक्षिण भारत के आर्द्र क्षेत्रों में तेजी से फैल रहा है। कई बार फल बाहर से पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देता है, लेकिन पकने के दौरान डंठल वाले भाग से काला पड़ना शुरू होता है और धीरे-धीरे पूरा फल अंदर तक सड़ जाता है।
इससे न केवल फल की गुणवत्ता और स्वाद प्रभावित होता है, बल्कि बाजार मूल्य, परिवहन क्षमता और निर्यात गुणवत्ता भी गंभीर रूप से घट जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में आम के कुल तुड़ाई-पश्चात नुकसान का बड़ा हिस्सा डंठल सड़न जैसी बीमारियों के कारण होता है।
क्या है डंठल सड़न रोग?
डंठल सड़न रोग एक विनाशकारी फफूंदजनित तुड़ाई-पश्चात बीमारी है, जो मुख्यतः लैसियोडिप्लोडिया थियोब्रोमे तथा डोथियोरेला समूह की फफूंदों द्वारा उत्पन्न होती है। ये रोगजनक फफूंद पेड़ की सूखी टहनियों, संक्रमित शाखाओं, पुराने सड़े फलों तथा फल के डंठल क्षेत्र में लंबे समय तक छिपी रहती हैं।
जब फल पकने लगता है और वातावरण में तापमान तथा नमी बढ़ती है, तब यह फफूंद तेजी से सक्रिय होकर फल में संक्रमण फैलाती है। यही कारण है कि कई बार खेत में स्वस्थ दिखने वाला फल बाजार या परिवहन के दौरान अचानक खराब हो जाता है।
रोग के प्रमुख लक्षण
डंठल के आसपास काला धब्बा: रोग की शुरुआत हमेशा फल के डंठल वाले भाग से होती है। वहां गहरा भूरा अथवा काला धब्बा दिखाई देता है।
तेजी से फैलता सड़न क्षेत्र: संक्रमित भाग धीरे-धीरे गोलाकार रूप में पूरे फल की ओर बढ़ने लगता है। प्रभावित क्षेत्र पानी से भीगा हुआ प्रतीत होता है।
गूदे का नरम और दुर्गंधयुक्त होना: फल का अंदरूनी गूदा मुलायम, पानीदार और कई बार दुर्गंधयुक्त हो जाता है। ऐसा फल खाने योग्य नहीं रहता।
भंडारण और परिवहन में अधिक नुकसान: यह रोग विशेष रूप से पकने और लंबी दूरी के परिवहन के दौरान तेजी से बढ़ता है। कई बार मंडी पहुंचने तक पूरा फल सड़ जाता है।
निर्यात खेप का अस्वीकृत होना: यदि पैकगृह या आयात करने वाले देश में संक्रमित फल मिल जाएं, तो पूरी खेप अस्वीकृत हो सकती है, जिससे भारी आर्थिक नुकसान होता है।
जलवायु परिवर्तन से क्यों बढ़ रहा है यह रोग?
असमय वर्षा और बढ़ती उमस: हाल के वर्षों में मई-जून के दौरान असमय वर्षा, गर्म रातें, अत्यधिक नमी और तापमान में उतार-चढ़ाव इस रोग के लिए अनुकूल वातावरण बना रहे हैं।
घने और बिना छंटाई वाले बाग: जिन बागों में वैज्ञानिक छंटाई नहीं होती, वहां हवा और धूप का संचार कम रहता है, जिससे फफूंद तेजी से बढ़ती है।
तुड़ाई के दौरान चोट: फल को डंडे से गिराना, मिट्टी पर पटकना या बिना डंठल के तोड़ना संक्रमण को बढ़ावा देता है।
संक्रमित अवशेषों की अनदेखी: सूखी शाखाएं, पुराने सड़े फल और संक्रमित अवशेष फफूंद के स्थायी स्रोत बने रहते हैं।
वैज्ञानिक एवं एकीकृत प्रबंधन रणनीति
‘स्वच्छ बाग + सुरक्षित तुड़ाई + गर्म जल उपचार + शीत भंडारण’ यही डंठल सड़न नियंत्रण का सबसे प्रभावी वैज्ञानिक सूत्र माना जा रहा है।
बाग प्रबंधन: रोग रोकथाम की पहली सीढ़ी
सूखी शाखाओं की वैज्ञानिक छंटाई: फूल आने से पहले तथा फसल के बाद सूखी, रोगग्रस्त और आपस में उलझी शाखाओं की छंटाई करें। इससे धूप और हवा का संचार बेहतर होता है।
संक्रमित अवशेष नष्ट करें: गिरे हुए सड़े फल, ममीकृत फल तथा संक्रमित टहनियों को बाग में न छोड़ें। इन्हें इकट्ठा कर नष्ट करें या गहरे गड्ढे में दबाएं।
संतुलित पोषण प्रबंधन: अत्यधिक नत्रजन फल को मुलायम बनाता है, जिससे रोग की संभावना बढ़ती है। पोटाश, कैल्शियम और सूक्ष्म पोषक तत्व फल की मजबूती तथा भंडारण क्षमता बढ़ाते हैं।
जैविक विकल्पों का प्रयोग: नवीन अनुसंधानों में ट्राइकोडर्मा तथा बैसिलस आधारित जैव उत्पाद प्रभावी पाए गए हैं। ये फफूंद के विकास को रोकते हैं और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम करते हैं।
फूल से तुड़ाई तक रोग सुरक्षा
सुरक्षात्मक फफूंदनाशी छिड़काव: फूल झड़ने के बाद से तुड़ाई से लगभग 15 दिन पहले तक आवश्यकता अनुसार कार्बेन्डाजिम, थियोफेनेट मिथाइल, एजोक्सीस्ट्रोबिन अथवा ताम्रयुक्त फफूंदनाशियों का वैज्ञानिक सलाह के अनुसार छिड़काव किया जा सकता है।
अवशेष सीमा का ध्यान रखें: निर्यात के लिए अवशेष-मुक्त उत्पादन अत्यंत आवश्यक है। इसलिए अंतिम छिड़काव का समय और मात्रा अनुशंसित सीमा में ही रखें।
ड्रोन आधारित छिड़काव: अब कई क्षेत्रों में ड्रोन आधारित लक्षित छिड़काव तकनीक अपनाई जा रही है, जिससे कम मात्रा में दवा का समान वितरण संभव हो रहा है और लागत भी घट रही है।
वैज्ञानिक तुड़ाई: सबसे महत्वपूर्ण चरण 8 से 10 मिलीमीटर डंठल अवश्य रखें: फल तोड़ते समय छोटा डंठल छोड़ना अत्यंत लाभकारी है। इससे लेसदार रस का रिसाव नियंत्रित होता है और फफूंद का प्रवेश कम होता है।
फल को गिरने न दें: फल तोड़ने वाले थैले या जाल का उपयोग करें। गिरने से बनने वाली सूक्ष्म दरारें संक्रमण का मुख्य मार्ग बनती हैं।
मिट्टी के संपर्क से बचाएं: तुड़ाई के बाद फल को सीधे जमीन पर न रखें। साफ प्लास्टिक क्रेट और गद्देदार ट्रे का उपयोग करें।
सुबह या शाम में तुड़ाई करें: अत्यधिक गर्म समय में तुड़ाई करने से फल में श्वसन दर बढ़ जाती है, जिससे रोग तेजी से विकसित हो सकता है।
तुड़ाई के बाद आधुनिक प्रबंधन
गर्म जल उपचार: आज विश्व स्तर पर यह तकनीक डंठल सड़न नियंत्रण में अत्यंत प्रभावी मानी जा रही है।
कैसे करें?: 52∘C पर 10 से 15 मिनट तुड़ाई के 24 घंटे के भीतर फलों को लगभग 52 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले गर्म पानी में 10 से 15 मिनट तक डुबोएं।
लाभ: फफूंद की सक्रियता कम होती है, रोग का प्रसार रुकता है, भंडारण अवधि बढ़ती है, निर्यात गुणवत्ता सुधरती है, फल की प्राकृतिक चमक बनी रहती है, अब कई आधुनिक पैकगृहों में गर्म जल उपचार के साथ पराबैंगनी किरण तथा ओजोन आधारित स्वच्छता तकनीकों पर भी कार्य हो रहा है।
शीत भंडारण और शीत श्रृंखला प्रबंधन
आदर्श तापमान: 10∘C से 13∘C इस तापमान पर नियंत्रित भंडारण रोग की वृद्धि को काफी हद तक रोकता है।
वायु संचार जरूरी: क्रेट और शीतगृह में पर्याप्त वायु संचार रखें। अत्यधिक नमी वाले बंद वातावरण में रोग तेजी से फैलता है।
पूर्व-शीतलन तकनीक: तुड़ाई के तुरंत बाद पूर्व-शीतलन करने से फल का तापमान तेजी से कम होता है और रोग का विकास धीमा पड़ता है।
कृत्रिम पकाव से सावधानी: अत्यधिक कृत्रिम पकाव तथा खराब वायु संचार फल को जल्दी नरम बनाकर रोग को बढ़ावा देते हैं।
निर्यात के लिए विशेष सावधानियां
आज यूरोप, मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में रोगमुक्त तथा अवशेष-मुक्त आम की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसलिए किसानों और निर्यातकों को निम्न बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए- अच्छी कृषि पद्धतियों को अपनाएं, खेत से पैकगृह तक स्वच्छता बनाए रखें, फलों की पहचान और रिकॉर्ड सुरक्षित रखें, शीत श्रृंखला विकसित करें, पैकगृह में फलों की ग्रेडिंग और स्वच्छता करें, प्रशिक्षित श्रमिकों से तुड़ाई कराएं
किसानों के लिए महत्वपूर्ण संदेश
डंठल सड़न केवल भंडारण की बीमारी नहीं, बल्कि“बाग से बाजार तक”जुड़ी एक संपूर्ण प्रबंधन चुनौती है। यदि किसान समय पर छंटाई, स्वच्छता, संतुलित पोषण, वैज्ञानिक तुड़ाई, गर्म जल उपचार तथा शीत भंडारण अपनाएं, तो तुड़ाई-पश्चात होने वाले नुकसान को 30 से 40 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण यह रोग और गंभीर हो सकता है। इसलिए अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक, स्वच्छ और निर्यातोन्मुख प्रबंधन अपनाने की आवश्यकता है। तभी भारतीय आम अपनी प्राकृतिक मिठास, सुगंध, चमक और वैश्विक प्रतिष्ठा को लंबे समय तक बनाए रख सकेगा।
यह भी पढ़े: प्राकृतिक रूप से सबसे पहले पकने वाले आम: बिहार से यूपी तक किस किस्म का दबदबा?
जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें। कृषि लेख, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित सटीक जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।

प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
