आज के समय में खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और पैदावार स्थिर हो गई है या घट रही है। इसका सबसे बड़ा कारण खेत की मिट्टी के स्वास्थ्य में आ रही गिरावट है। अंधाधुंध रासायनिक खादों के प्रयोग से मिट्टी की उर्वरक क्षमता नष्ट हो रही है।
इस समस्या का एकमात्र और सबसे प्रामाणिक समाधान है मिट्टी का परीक्षण (सॉइल टेस्टिंग)। आज हम मिट्टी जांच की पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया, खेत से नमूना लेने का सही तरीका और उसे प्रयोगशाला तक पहुंचाने की विधि को सरल भाषा में समझेंगे।
मिट्टी परीक्षण (सॉइल टेस्टिंग) के मुख्य फायदे
मिट्टी की जांच कराने से सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि उसे पता चल जाता है कि उसके खेत की मिट्टी में किस पोषक तत्व (जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, जिंक, सल्फर आदि) की कितनी मात्रा उपलब्ध है और किस तत्व की भारी कमी है। इसके आधार पर किसान केवल वही खाद खरीदता है जिसकी वास्तव में जरूरत होती है, जिससे बेवजह महंगी खाद खरीदने का खर्च बचता है।
इसके अलावा, मिट्टी परीक्षण से जमीन के पीएच मान (क्षारीयता या अम्लीयता) और उसमें मौजूद जैविक कार्बन (ऑर्गेनिक कार्बन) का भी सटीक पता चलता है। क्षारीय या अम्लीय मिट्टी की पहचान होने पर जिप्सम या चूने का प्रयोग करके मिट्टी का समय रहते सुधार किया जा सकता है। सही पोषण मिलने से फसल रोगमुक्त रहती है और बंपर पैदावार देती है।
मिट्टी का नमूना लेने का सही समय
मिट्टी का नमूना लेने के लिए सबसे उपयुक्त समय वह होता है जब खेत पूरी तरह से खाली हो। यानी रबी या खरीफ की फसल कटने के बाद और अगली फसल की बुवाई या जुताई करने से पहले का समय सबसे अच्छा माना जाता है। ध्यान रखें कि जिस खेत में हाल ही में खाद, उर्वरक या कोई रासायनिक दवा डाली गई हो, वहां से तुरंत नमूना न लें।
खाद डालने के कम से कम दो से तीन महीने बाद ही मिट्टी की जांच के लिए नमूना लेना चाहिए। इसके अलावा, खेत में बहुत अधिक नमी या कीचड़ होने पर भी नमूना नहीं लेना चाहिए। मिट्टी भुरभुरी और हल्की नम अवस्था में होनी चाहिए।
नमूना लेने के लिए आवश्यक सामग्री
खेत से मिट्टी निकालने के लिए आपको कुछ बुनियादी चीजों की आवश्यकता होगी। सबसे पहले एक साफ फावड़ा या खुरपी लें। मिट्टी इकट्ठा करने के लिए एक बिल्कुल साफ बाल्टी या टब लें।
ध्यान रहे कि बाल्टी में पहले से किसी भी प्रकार की खाद, कीटनाशक या तेल-ग्रीस का अंश नहीं होना चाहिए, अन्यथा जांच रिपोर्ट गलत आ सकती है। इसके अलावा, मिट्टी को रखने के लिए एक साफ कपड़े की थैली या साफ पॉलीथिन की आवश्यकता होगी। कभी भी खाद या कीटनाशक की पुरानी बोरी का इस्तेमाल नमूना रखने के लिए न करें।
नमूना लेने से पहले की महत्वपूर्ण सावधानियां
खेत से नमूना लेते समय कुछ स्थानों से मिट्टी बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए। पेड़ की जड़ों के पास से, मेड़ के बिल्कुल किनारे से, खाद के गड्ढे या कूड़े के ढेर के पास से, पानी की नाली या सिंचाई के रास्ते के पास से मिट्टी का नमूना कभी न लें।
इन स्थानों की मिट्टी पूरे खेत की मिट्टी का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती है। यदि आपका खेत बड़ा है और उसमें कुछ हिस्सा ऊंचा और कुछ हिस्सा नीचा है, या मिट्टी का रंग अलग-अलग है, तो ऊंचे और नीचे हिस्से से अलग-अलग नमूने लेने चाहिए और उन्हें मिलाना नहीं चाहिए।
खेत से मिट्टी का नमूना लेने की वैज्ञानिक विधि (वी-शेप मेथड)
एक एकड़ खेत का सही प्रतिनिधित्व करने के लिए पूरे खेत में से कम से कम 8 से 10 अलग-अलग जगहों से मिट्टी निकालनी होती है। नमूना लेने के लिए खेत में हमेशा ‘जिग-जैग’ (टेढ़े-मेढ़े) तरीके से चलें ताकि खेत का कोई भी कोना न छूटे।
सबसे पहले चुनी गई जगह की ऊपरी सतह से घास-फूस, कंकड़, सूखी पत्तियां या जड़ें हटा दें। लेकिन ध्यान रहे कि ऊपर की उपजाऊ मिट्टी को खुरच कर न हटाएं। इसके बाद उस साफ की गई जगह पर फावड़े या खुरपी की मदद से अंग्रेजी के ‘V’ (वी) आकार का एक गड्ढा खोदें। यह गड्ढा सामान्य फसलों के लिए लगभग 15 सेंटीमीटर (6 इंच) गहरा होना चाहिए।
यदि आप बागवानी या फलदार पेड़ लगाने जा रहे हैं, तो गड्ढा 3 फीट गहरा होना चाहिए। ‘V’ आकार का गड्ढा खोदने के बाद, उस गड्ढे की पूरी मिट्टी को बाहर निकाल कर अलग रख दें। अब उस ‘V’ आकार के गड्ढे की एक सीधी दीवार से ऊपर से लेकर नीचे तक (सतह से 15 सेंटीमीटर की गहराई तक) खुरपी की मदद से लगभग एक इंच मोटी मिट्टी की एक परत (स्लाइस) काट लें।
इस कटी हुई मिट्टी को अपनी साफ बाल्टी में डाल लें। इसी प्रक्रिया को पूरे खेत में चुने गए सभी 8 से 10 स्थानों पर दोहराएं और सभी जगहों से एक-एक इंच की परत काटकर बाल्टी में इकट्ठा कर लें।
मिट्टी का नमूना तैयार करने की विधि (क्वार्टरिंग मेथड)
अब आपकी बाल्टी में पूरे खेत की मिट्टी इकट्ठा हो चुकी है, जो लगभग 2 से 3 किलोग्राम होगी। इतनी सारी मिट्टी को प्रयोगशाला में नहीं भेजा जा सकता। इसे कम करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया को ‘क्वार्टरिंग मेथड’ कहते हैं।
सबसे पहले बाल्टी में इकट्ठा की गई पूरी मिट्टी को किसी साफ फर्श, तिरपाल या अखबार पर गोल आकार में फैला लें। इस मिट्टी को हाथों से अच्छी तरह मिला लें और यदि इसमें कोई कंकड़, पत्थर, कांच का टुकड़ा या मोटी जड़ हो, तो उसे बाहर निकाल दें।
मिट्टी के ढेलों को फोड़कर भुरभुरा कर लें। अब इस गोल फैलाई गई मिट्टी में उंगली या लकड़ी की मदद से ‘प्लस’ (+) का निशान बनाएं, जिससे पूरी मिट्टी चार बराबर हिस्सों (तिमाहियों) में बंट जाए।
अब इन चार हिस्सों में से आमने-सामने के दो हिस्सों की मिट्टी को हटाकर फेंक दें। बाकी बचे हुए दो हिस्सों की मिट्टी को फिर से आपस में अच्छी तरह मिलाएं, गोल आकार में फैलाएं और फिर से चार हिस्सों में बांटें। फिर से आमने-सामने के दो हिस्से हटा दें। इस प्रक्रिया को तब तक दोहराते रहें जब तक कि आपके पास केवल आधा किलोग्राम (500 ग्राम) मिट्टी न बच जाए।
इस 500 ग्राम मिट्टी को छाया में सूखने के लिए रख दें। कभी भी मिट्टी को तेज धूप में या आग के पास रखकर न सुखाएं, क्योंकि तेज गर्मी से मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव (बैक्टीरिया) मर सकते हैं और नाइट्रोजन की मात्रा उड़ सकती है, जिससे रिपोर्ट गलत आएगी।
नमूने की पैकिंग और आवश्यक जानकारी
जब मिट्टी छाया में अच्छी तरह सूख जाए, तो उसे एक साफ कपड़े की थैली या नई पॉलीथिन में भर लें। अब एक कागज की पर्ची पर कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारियां साफ-साफ अक्षरों में लिखें।
इस पर्ची में अपना नाम, पिता का नाम, गांव का नाम, पोस्ट ऑफिस, जिला, मोबाइल नंबर, खेत का खसरा नंबर या पहचान, खेत की सिंचाई का साधन (नहर या ट्यूबवेल), खेत में ली गई पिछली फसल का नाम और अगली बोई जाने वाली फसल का नाम जरूर लिखें। इस पर्ची की दो प्रतियां बनाएं।
एक पर्ची को पॉलीथिन के अंदर मिट्टी के साथ डाल दें और दूसरी पर्ची को थैली के बाहर अच्छी तरह से चिपका दें या बांध दें। यह जानकारी कृषि वैज्ञानिकों के लिए बहुत जरूरी होती है क्योंकि वे अगली बोई जाने वाली फसल की आवश्यकता के अनुसार ही आपको खाद की सिफारिश करते हैं।
मिट्टी की जांच कहां और कैसे कराएं?
अब बात आती है कि इस तैयार नमूने को जांच के लिए कहां भेजना है। भारत सरकार और राज्य सरकारों ने किसानों की सुविधा के लिए हर जिले में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाएं (सॉइल टेस्टिंग लैब्स) स्थापित की हैं।
आप अपने नमूने को निम्नलिखित स्थानों पर जमा कर सकते हैं। पहला स्थान है आपके जिले का कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके)। भारत के लगभग हर जिले में एक कृषि विज्ञान केंद्र होता है जहां कृषि वैज्ञानिक बैठते हैं और वहां मिट्टी जांच की अत्याधुनिक सुविधा उपलब्ध होती है।
दूसरा विकल्प है राज्य सरकार के कृषि विभाग की सरकारी प्रयोगशालाएं जो आमतौर पर जिला मुख्यालय पर स्थित होती हैं। इसके अलावा, कई जगहों पर ब्लॉक स्तर (विकास खंड) के कृषि बीज गोदाम या कृषि रक्षा इकाई पर भी मिट्टी के नमूने जमा करने की सुविधा होती है, जहां से वे स्वयं उसे जिले की लैब में भेज देते हैं।
आजकल कई मोबाइल सॉइल टेस्टिंग वैन
(चलती-फिरती प्रयोगशालाएं) भी गांव-गांव जाकर मिट्टी की जांच करती हैं। इसके अलावा, कई निजी कंपनियां और सहकारी समितियां (जैसे इफको, कृभको) भी मुफ्त या नाममात्र के शुल्क पर मिट्टी परीक्षण की सुविधा प्रदान करती हैं।
मिट्टी की जांच के बाद आपको एक ‘सॉइल हेल्थ कार्ड’ (मृदा स्वास्थ्य कार्ड) दिया जाता है। इस कार्ड में आपकी मिट्टी की पूरी कुंडली लिखी होती है और यह भी बताया जाता है कि अगली फसल के लिए आपको कौन सी खाद, कितनी मात्रा में डालनी है।
किसान भाइयों, एक बार अपनी मिट्टी की जांच जरूर कराएं। यह आपके खेत का सबसे अहम निवेश है जो आपको सालों तक फायदा देगा। इस लेख को अपने अन्य किसान मित्रों के साथ भी साझा करें ताकि वे भी वैज्ञानिक तरीके से मिट्टी का नमूना लेना सीख सकें और अपनी खेती को लाभ का सौदा बना सकें।
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