भारत में खेती का सबसे बड़ा अनकहा संकट आज नीलगाय बन चुकी है। यह सिर्फ एक जंगली जानवर नहीं, बल्कि किसानों की फसल, आय और खेती के पूरे ढांचे को प्रभावित करने वाली समस्या है। खासकर दलहनी फसलें जैसे मसूर, अरहर और मूंग- जो कभी बिहार की पहचान थीं। आज धीरे-धीरे खेतों से गायब होती जा रही हैं।
इसका मुख्य कारण नीलगाय का बढ़ता प्रकोप है, जिसने किसानों को मजबूर कर दिया है कि वे अपनी खेती का तरीका ही बदल दें।पहले बिहार के खेतों में विविधता हुआ करती थी। अरहर, ज्वार, बाजरा और चना जैसी फसलें आम थीं। ये फसलें न सिर्फ किसानों को अच्छा मुनाफा देती थीं, बल्कि मिट्टी की सेहत के लिए भी बेहद जरूरी थीं।
दलहनी फसलें प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) करती हैं, जिससे मिट्टी उपजाऊ बनी रहती है। लेकिन आज स्थिति यह है कि किसान इन फसलों को छोड़कर धान और गेहूं जैसी फसलों पर निर्भर होते जा रहे हैं, जो ज्यादा पानी लेती हैं और मिट्टी पर भी दबाव बढ़ाती हैं। नीलगाय का व्यवहार इस बदलाव की जड़ में है।
यह जानवर झुंड में चलते है और सबसे ज्यादा पौष्टिक व नरम फसलों को नुकसान पहुंचाते है। अरहर, चना और मूंग इसकी पहली पसंद होती हैं। यह सिर्फ फसल खाते ही नहीं, बल्कि खेत में चलकर, रौंदकर और बैठकर भी भारी नुकसान करते है। कई बार एक रात में पूरी फसल बर्बाद हो जाती है। यही कारण है कि किसान अब जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं।
आंकड़ों से भी यह स्पष्ट है कि बिहार में दलहनी फसलों का रकबा लगातार घट रहा है। राज्य में कुल खेती का लगभग 6% ही हिस्सा दलहन के अंतर्गत बचा है। भोजपुर जैसे जिलों में तो यह गिरावट और तेज है। यह सिर्फ उत्पादन की समस्या नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और मिट्टी की सेहत से जुड़ा मुद्दा भी है।
जब दलहन कम होंगे, तो मिट्टी की उर्वरता घटेगी और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ेगी। नीलगाय की बढ़ती संख्या के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है प्राकृतिक आवास का खत्म होना। जंगलों की कटाई, जल स्रोतों की कमी और भोजन की उपलब्धता घटने से ये जानवर गांवों और खेतों की ओर रुख कर रहे हैं।
इसके अलावा इनके प्राकृतिक शिकारी लगभग खत्म हो चुके हैं, जिससे इनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है। शोध बताते हैं कि जहां नीलगाय की संख्या ज्यादा है, वहां फसलों का नुकसान 50 से 70% तक पहुंच रहा है। किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है- सुरक्षा। हर किसान के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वह अपने पूरे खेत को सुरक्षित कर सके।
इसलिए अब लोग छोटे-छोटे हिस्सों में खेती कर रहे हैं या फिर जाल (नेट) लगाकर सीमित क्षेत्र को बचा रहे हैं। जाल लगाना फिलहाल सबसे प्रभावी उपाय माना जा रहा है, लेकिन यह महंगा और श्रमसाध्य है। कई किसान बिजली के झटके वाले तार (Electric Fencing) का भी उपयोग कर रहे हैं, लेकिन यह हर किसी के लिए संभव नहीं है।
कुछ किसान खेत के पास झोपड़ी बनाकर रातभर रखवाली करते हैं। यह तरीका पारंपरिक जरूर है, लेकिन आज के समय में यह टिकाऊ समाधान नहीं कहा जा सकता। एक किसान के लिए हर रात खेत की निगरानी करना न तो व्यावहारिक है और न ही सुरक्षित। सरकारी स्तर पर भी इस समस्या को स्वीकार किया गया है।
बिहार के अधिकांश जिलों में नीलगाय का प्रभाव है। इसे वर्मिन (हानिकारक जीव) की श्रेणी में रखा गया, जिससे नियंत्रित शिकार की अनुमति दी गई। कुछ वर्षों में हजारों नीलगायों को मारा भी गया, लेकिन इससे समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया। क्योंकि मूल कारण-आवास की कमी और अनियंत्रित प्रजनन-अब भी मौजूद हैं।
यह समस्या सिर्फ बिहार की नहीं, बल्कि पूरे भारत के कई राज्यों में देखने को मिल रही है। इसलिए इसका समाधान भी व्यापक और संतुलित होना चाहिए। केवल शिकार या मारने से समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए दीर्घकालिक रणनीति जरूरी है। सबसे पहले, सामुदायिक स्तर पर फसल सुरक्षा की योजना बनानी होगी।
अगर गांव के किसान मिलकर सामूहिक फेंसिंग करें, तो लागत कम होगी और सुरक्षा बेहतर होगी। दूसरा, सरकार को सब्सिडी के साथ मजबूत और टिकाऊ फेंसिंग सिस्टम उपलब्ध कराना चाहिए। तीसरा, वन क्षेत्रों का संरक्षण और पुनर्विकास जरूरी है, ताकि जंगली जानवरों को उनका प्राकृतिक आवास वापस मिल सके।
इसके अलावा फसल विविधीकरण को भी बढ़ावा देना होगा, लेकिन ऐसी किस्मों के साथ जो नीलगाय के लिए कम आकर्षक हों। साथ ही, तकनीकी समाधान जैसे सोलर फेंसिंग, सेंसर आधारित अलर्ट सिस्टम और ड्रोन निगरानी जैसे विकल्पों पर भी काम किया जा सकता है। किसान और वन्यजीव दोनों ही इस पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं।
टकराव का समाधान संतुलन में ही है। अगर समय रहते इस समस्या पर गंभीरता से काम नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में दलहनी फसलें और भी कम होती जाएंगी और खेती का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। किसानों के लिए यह सिर्फ फसल बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी खेती, अपनी मिट्टी और अपने भविष्य को बचाने की लड़ाई है।
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