हरियाणा में इन दिनों गन्ने की खेती गिरते उत्पादन और बढ़ती लागत जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे मुश्किल समय में यमुनानगर जिले के गिल्लौर माजरी गांव के एक प्रगतिशील किसान निर्मल सिंह ने खेती का एक नया और मुनाफेदार रास्ता दिखाया है। निर्मल सिंह पिछले 15 वर्षों से अपने 30 एकड़ खेत में पारंपरिक तरीकों को छोड़कर ‘चौड़ी कतार’ यानी वाइड-रो पद्धति से गन्ने की खेती कर रहे हैं।
वे गन्ने की बुवाई 2.5 फीट की बजाय 4 फीट की दूरी पर करते हैं, जिससे उन्हें लगातार शानदार परिणाम मिल रहे हैं। खेत में कतारें कम होने के बावजूद उनकी औसत उपज 425 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच रही है। इस तकनीक के दम पर वे सालाना करीब 15 लाख रुपय की आय प्राप्त कर रहे हैं। उन्हें प्रति एकड़ लगभग 50 हजार रुपय का शुद्ध मुनाफा हो रहा है, जो पारंपरिक खेती से होने वाले 30 हजार रुपय के मुनाफे से काफी अधिक है। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा खेती में मशीनों के आसान इस्तेमाल के रूप में सामने आया है।
ट्रैक्टर और अन्य उपकरणों के उपयोग से श्रमिकों पर निर्भरता और उनकी लागत काफी कम हो जाती है। इसके साथ ही गन्ने के बीज की खपत भी घटकर 18 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ रह जाती है, जबकि पारंपरिक तरीके में यह 35 क्विंटल तक लगती थी। इस आधुनिक पद्धति से पानी की भी भारी बचत होती है और इसकी खपत लगभग आधी होकर 9 से 10 लाख लीटर प्रति एकड़ तक आ जाती है।
इस तकनीक के फायदों को देखते हुए राज्य सरकार ने भी अब किसानों के लिए प्रोत्साहन राशि को 3,000 रुपय से बढ़ाकर 5,000 रुपय प्रति एकड़ कर दिया है। चौड़ी कतार तकनीक न केवल उत्पादन बढ़ाने में मददगार है, बल्कि इससे गन्ने के रस की गुणवत्ता में भी काफी सुधार होता है। श्रमिकों की कमी जैसी रोजमर्रा की समस्या भी इससे हल हो जाती है।
हालांकि, इन तमाम फायदों के बावजूद राज्य में इस लाभकारी तकनीक को अपनाने वाले किसानों की दर अभी केवल 10 प्रतिशत के आसपास ही है। कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अगर राज्य में गन्ना क्षेत्र को फिर से पुनर्जीवित करना है, तो ऐसी संसाधन-कुशल और वैज्ञानिक तकनीकों का बड़े पैमाने पर विस्तार करना होगा। यही वह रास्ता है जिससे उत्पादन बढ़ेगा और भविष्य के लिए गन्ने की खेती पूरी तरह से टिकाऊ बन सकेगी।
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