पपीता (Carica Papaya L.) भारत की सबसे तेजी से फल देने वाली व्यावसायिक फल फसलों में से एक है। रोपण के लगभग 8 से 10 महीनों में फल देना प्रारम्भ कर देने के कारण यह किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी फसल मानी जाती है। भारत आज विश्व का सबसे बड़ा पपीता उत्पादक देश है तथा वैश्विक उत्पादन का लगभग 40 से 45 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत से आता है। देश में लगभग 1.4 से 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पपीते की खेती की जाती है तथा वार्षिक उत्पादन 55 से 60 लाख टन के आसपास है।
गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु तथा बिहार इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। बिहार में भी पपीते की खेती लगातार बढ़ रही है, किन्तु वर्षा ऋतु में रोगों के कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। कई क्षेत्रों में जड़ सड़न एवं विषाणुजनित रोगों के कारण 60 से 90 प्रतिशत तक पौधे नष्ट होने की घटनाएँ देखी गई हैं।
जुलाई-अगस्त क्यों है सबसे संवेदनशील समय?
मानसून के दौरान लगातार वर्षा, 80 से 95 प्रतिशत तक आर्द्रता, खेतों में जलजमाव तथा 25 से 32°C तापमान रोगजनक फफूंद एवं कीटों के विकास के लिए आदर्श वातावरण तैयार कर देते हैं। यही कारण है कि जुलाई और अगस्त के महीने पपीते के लिए सबसे अधिक जोखिम वाले माने जाते हैं।
इस अवधि में मुख्यतः निम्न समस्याएँ देखने को मिलती हैं- जड़ सड़न (Root Rot), कॉलर रॉट, डैम्पिंग-ऑफ, फाइटोफ्थोरा फल सड़न, पपीता रिंग स्पॉट वायरस (PRSV), लीफ कर्ल एवं मोजेक रोग, एफिड एवं सफेद मक्खी जैसे वाहक कीटों का प्रकोप
जड़ सड़न: वर्षा ऋतु की सबसे विनाशकारी बीमारी
पपीते में जड़ सड़न मुख्यतः Fusarium Solani, Phytophthora Spp. तथा Pythium Spp. के कारण होती है। ये रोगजनक मिट्टी में कई वर्षों तक जीवित रह सकते हैं और जलभराव की स्थिति में अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं। यदि खेत में 24 से 48 घंटे से अधिक समय तक पानी जमा रहे, तो पौधों की जड़ें ऑक्सीजन के अभाव में कमजोर हो जाती हैं तथा रोग तेजी से फैलने लगता है।
प्रमुख लक्षण
- पौधों की वृद्धि रुक जाना
- पत्तियों का पीला पड़ना
- पत्तियों का नीचे की ओर झुकना
- तने के आधार पर सड़न
- जड़ों का काला एवं गल जाना
- अंततः पूरे पौधे का सूख जाना
जड़ सड़न से बचाव के स्मार्ट उपाय
जल निकासी सर्वोपरि: पपीते में सबसे प्रभावी उपाय जल निकासी है। प्रत्येक पौधे के चारों ओर 10–15 सेमी (4–6 इंच) ऊँचा थल्ला बनाएं। खेत में ढाल रखें। नालियों की नियमित सफाई करें। किसी भी स्थिति में पानी 24 घंटे से अधिक न ठहरे।
जैविक नियंत्रण अपनाएँ: वर्षा ऋतु में Trichoderma Asperellum + Bacillus Subtilis प्रमाणित जैव उत्पादों का प्रयोग अत्यंत लाभकारी पाया गया है। ये लाभकारी सूक्ष्मजीव- रोगजनक फफूंद की वृद्धि रोकते हैं। जड़ों की सुरक्षा करते हैं। पौधों की वृद्धि बढ़ाते हैं। मिट्टी के सूक्ष्मजीव संतुलन को सुधारते हैं। पौधों की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
हाल के विश्वविद्यालयीय अनुसंधानों में जैविक सूक्ष्मजीव आधारित मिश्रित जैव-फॉर्मूलेशन द्वारा जड़ सड़न के प्रभावी नियंत्रण के अत्यंत उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हुए हैं।
रासायनिक प्रबंधन: जहाँ रोग का दबाव अधिक हो, वहाँ आवश्यकता अनुसार पौधों की जड़ों के पास Hexaconazole 5 EC @ 2 मिली प्रति लीटर पानी का घोल तैयार कर प्रति पौधा लगभग 5 से 6 लीटर घोल द्वारा मिट्टी भिगोएँ। रोग की तीव्रता के अनुसार 30 से 40 दिनों के अंतराल पर उपचार दोहराया जा सकता है।
फसल चक्र अपनाएँ: लगातार एक ही खेत में पपीता लगाने से मिट्टी में रोगजनकों की संख्या बढ़ जाती है।
इसलिए पपीते के बाद दलहनी फसलें लें। संक्रमित खेत में लगातार पपीता न लगाएँ।
पपीता रिंग स्पॉट वायरस: अदृश्य लेकिन घातक दुश्मन
Papaya Ring Spot Virus (PRSV) देशभर में पपीते का सबसे महत्वपूर्ण विषाणुजनित रोग माना जाता है।
यह मुख्यतः एफिड (Aphids) द्वारा फैलता है।
लक्षण
- पत्तियों पर गहरे एवं हल्के हरे रंग का मोजेक
- छल्लेदार धब्बे
- पत्तियों का सिकुड़ना
- फल पर रिंग जैसे धब्बे
- पौधों का बौनापन
- उत्पादन में भारी गिरावट
- एक बार पौधा संक्रमित हो जाने पर इसका कोई उपचार उपलब्ध नहीं है।
वायरस से बचाव कैसे करें?
वाहक कीटों का नियंत्रण: 2 प्रतिशत नीम तेल का छिड़काव करें। प्रति लीटर पानी में लगभग 0.5 मिली स्टिकर मिलाएँ। 20–30 दिन के अंतराल पर नियमित छिड़काव करें।
संक्रमित पौधे हटाएँ: रोगग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करें। खेत में संक्रमित पौधे न छोड़ें।
खरपतवार नियंत्रण: कई खरपतवार वायरस के वैकल्पिक पोषक पौधे होते हैं। इसलिए नियमित निराई अत्यंत आवश्यक है।
पौध पोषण भी है रोग प्रबंधन का महत्वपूर्ण भाग
संतुलित पोषण प्राप्त पौधे रोगों का बेहतर सामना करते हैं। वर्षा ऋतु में निम्न फोलियर स्प्रे लाभकारी पाया गया है- यूरिया 5 ग्राम, जिंक सल्फेट 4 ग्राम, बोरॉन 4 ग्राम, प्रति लीटर पानी में मिलाकर 30–40 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें। इससे नई वृद्धि बेहतर होती है। फूल एवं फल अधिक लगते हैं। फल की गुणवत्ता सुधरती है। पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
वर्षा ऋतु में किसान क्या सावधानी रखें?
- जलभराव बिल्कुल न होने दें।
- वर्षा के दिनों में अतिरिक्त सिंचाई न करें।
- संक्रमित खेत से स्वस्थ खेत में पानी न जाने दें।
- औजारों को कीटाणुरहित रखें।
- प्रत्येक सप्ताह पौधों का निरीक्षण करें।
- प्रारम्भिक लक्षण दिखते ही उपचार प्रारम्भ करें।
उपयुक्त किस्मों का चयन भी आवश्यक
स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त किस्मों का चयन सफलता की पहली शर्त है। उत्तर भारत एवं बिहार की परिस्थितियों में पूसा डिलीशियस, पूसा मेजेस्टी, पूसा जायंट तथा पूसा नन्हा जैसी किस्मों का प्रदर्शन संतोषजनक पाया गया है। कुछ क्षेत्रों में सूर्या एवं कुछ CO श्रृंखला की किस्में अधिक वर्षा एवं जड़ सड़न की परिस्थितियों में अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील पाई गई हैं। इसलिए स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केन्द्र की अनुशंसा के आधार पर ही किस्म का चयन करना चाहिए।
समेकित रोग प्रबंधन (Integrated Disease Management) ही है स्थायी समाधान
पपीते में किसी एक उपाय से पूर्ण सफलता नहीं मिलती। सर्वोत्तम परिणाम निम्न समेकित रणनीति अपनाने से प्राप्त होते हैं- ऊँची क्यारी एवं प्रभावी जल निकासी। स्वस्थ एवं प्रमाणित पौधों का रोपण। ट्राइकोडर्मा आधारित जैविक उत्पादों का प्रयोग। आवश्यकता अनुसार हेक्साकोनाजोल द्वारा ड्रेंचिंग। नीम तेल द्वारा वाहक कीटों का नियंत्रण। संतुलित पोषण एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग।संक्रमित पौधों का तत्काल निष्कासन। नियमित खेत निरीक्षण एवं प्रारम्भिक निदान।
निष्कर्ष: रोकथाम ही सबसे सस्ता और सबसे प्रभावी उपाय
पपीते में वर्षा ऋतु के दौरान होने वाले अधिकांश रोग समय पर उचित प्रबंधन द्वारा नियंत्रित किए जा सकते हैं। खेत की उचित तैयारी, उत्कृष्ट जल निकासी, जैविक एवं रासायनिक उपायों का संतुलित उपयोग, नियमित निगरानी तथा समेकित रोग प्रबंधन अपनाकर किसान जड़ सड़न एवं विषाणुजनित रोगों से होने वाली भारी क्षति से अपनी फसल को बचा सकते हैं।
याद रखें- पपीते में रोग का उपचार कठिन है, लेकिन समय रहते की गई रोकथाम अत्यंत सरल, कम खर्चीली और अधिक प्रभावी है। यदि प्रारम्भिक लक्षण दिखाई दें तो निकटतम कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि विश्वविद्यालय अथवा पौध रोग विशेषज्ञ से तुरंत संपर्क करें। सही सलाह, सही समय पर किया गया प्रबंधन और वैज्ञानिक तकनीकों का समन्वित उपयोग ही वर्षा ऋतु में स्वस्थ पपीता उत्पादन की सफलता की कुंजी है।
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q. पपीते में वर्षा ऋतु के दौरान ‘जड़ सड़न’ (Root Rot) का मुख्य कारण क्या है?
Ans. पपीते में जड़ सड़न मुख्यतः Fusarium Solani, Phytophthora और Pythium नामक फफूंद के कारण होती है। खेत में 24 से 48 घंटे से अधिक जलभराव होने पर जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिलती, जिससे यह रोग तेजी से फैलता है।
Q. पपीते के पौधे को जड़ सड़न से बचाने के लिए किस रसायन से ड्रेंचिंग (Drenching) करनी चाहिए?
Ans. रोग के लक्षण दिखते ही Hexaconazole 5 EC @ 2 मिली प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर प्रति पौधा 5 से 6 लीटर घोल जड़ों के पास मिट्टी में डालें (ड्रेंचिंग करें)।
Q. पपीता रिंग स्पॉट वायरस (PRSV) को फैलने से कैसे रोका जा सकता है?
Ans. चूंकि वायरस का कोई सीधा इलाज नहीं है, इसलिए इसे फैलाने वाले एफिड कीटों को रोकने के लिए 2% नीम तेल (स्टिकर के साथ) का छिड़काव करें और संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट कर दें।
Q. मानसून में पपीते में कौन सा सूक्ष्म पोषक तत्व स्प्रे (Foliar Spray) करना चाहिए?
Ans. प्रति लीटर पानी में 5 ग्राम यूरिया, 4 ग्राम जिंक सल्फेट और 4 ग्राम बोरॉन मिलाकर 30-40 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करने से पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
Q. उत्तर भारत और बिहार की जलवायु के लिए पपीते की कौन सी किस्म सबसे अच्छी मानी जाती है?
Ans. उत्तर भारत और बिहार के लिए पूसा डिलीशियस (Pusa Delicious), पूसा मेजेस्टी (Pusa Majesty), पूसा जायंट और पूसा नन्हा जैसी किस्में पपीता उत्पादन के लिए बहुत उपयुक्त मानी जाती हैं।
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प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
