आईआईटी मुंबई में एक अध्ययन में बताया गया है कि पिछले 20 सालों में पश्चिमी घाट में मिट्टी के कटाव दर 95 प्रतिशत बढ़ गई हैं। इस अध्ययन के मुताबिक तमिलनाडु में मिट्टी का कटाव सबसे अधिक यानी 121 प्रतिशत, गुजरात में 119 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 97 प्रतिशत, केरल में 90 प्रतिशत और गोवा में 80 प्रतिशत बढ़ा है। प्रोफेसर पेन्नान चित्रासामी और वैशाली होनुप के एक अध्ययन में पाया गया है कि 1990 में पश्चिमी घाट में प्रति हेक्टेयर 33 टन से अधिक मिट्टी बह गई थी, जबकि 2020 में यह आंकड़ा 62 टन 700 क्विंटल तक पहुंच गया है।
मृदा अपरदन बढ़ने से कृषि उत्पादन में कमी, पानी की गुणवत्ता में कमी, ताजे पानी के स्रोतों पर प्रभाव पड़ता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक जलवायु परिवर्तन और भूमि के दुरुपयोग के कारण मिट्टी के कटाव के दर में वृद्धि देखने को मिल रही हैं। शोधकर्ताओं ने मिट्टी के कटाव को नियंत्रित करने के लिए पश्चिमी घाट में मानवीय हस्तक्षेप घटाने और संरक्षण प्रयासों को बढ़ाने के लिए ठोस नीतियों के तत्काल कार्यान्वयन की आवश्यकता व्यक्त की हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक मिट्टी के दीर्घकालिक कटाव की जांच करने वाला यह इस तरह का पहला अध्ययन हैं।
पश्चिमी घाट भारत का एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और आर्थिक क्षेत्र है। इस क्षेत्र में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। पश्चिमी घाट भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है। इस क्षेत्र की जैव विविधता को संरक्षित करने और मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए सभी हितधारकों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है।
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