सभी किसान भाई दिन रात अपनी धरती माता का सीना चीरकर उसमें से अपने परिवार और पूरे देश के लिए अनाज पैदा करते हैं। कड़कड़ाती ठंड हो, सावन की झड़ी हो या फिर जेठ की चिलचिलाती धूप, किसानों का पसीना हमेशा उनके खेतों में गिरता है।
लेकिन किसान भाइयों आज हमें एक पल के लिए रुक कर यह सोचना होगा कि हम जो खेती आज कर रहे हैं, क्या वह सही रास्ते पर जा रही है। आप और हम सभी यह भली-भांति देख रहे हैं कि आज हमारी खेती में लागत कितनी ज्यादा बढ़ गई है।
बाजार से महंगे हाइब्रिड बीज लाओ, फिर बोरी भर-भर कर यूरिया और DAP डालो, कीड़े लग जाएं तो हजारों रुपय की जहरीली दवाइयां लाकर खेतों में छिड़को। हम अपनी खून पसीने की कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ इन बाहरी चीजों को खरीदने में लगा देते हैं और जब फसल कटकर मंडी में जाती है, तो हमारे हाथ में मुनाफा बहुत ही कम बचता है।
कई बार तो लागत भी पूरी नहीं निकल पाती और हमारे कई भाई कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। इसके साथ ही, इन जहरीले रसायनों और खादों ने हमारी धरती माता की सेहत को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है। हमारी मिट्टी, जो कभी बहुत मुलायम और जानदार हुआ करती थी, आज पत्थर की तरह सख्त हो गई है। उसमें केंचुए और मित्र कीट दिखाई नहीं देते।
पानी का स्तर नीचे जा रहा है और मौसम का बदलाव हमारी फसलों को बर्बाद कर रहा है। ऐसे में हमें खेती के एक ऐसे तरीके की जरूरत है जिसमें हमारा खर्च कम हो, जमीन की ताकत बढ़े और फसल भी अच्छी हो। किसान भाइयों इसी परेशानी का सबसे पक्का और शानदार उपाय है प्राकृतिक खेती, जिसे हम जीरो बजट प्राकृतिक खेती भी कहते हैं।
यह कोई नई चीज नहीं है, बल्कि यह वही तरीका है जिससे हमारे पुरखे खेती किया करते थे, लेकिन इसे आज के समय के हिसाब से थोड़ा और वैज्ञानिक रूप दे दिया गया है। प्राकृतिक खेती का सीधा सा मतलब है कि हमें बाजार से कोई भी महंगी खाद या कीटनाशक खरीदने की जरूरत नहीं है।
हमारी खेती में काम आने वाली हर चीज हमारे अपने खेत और हमारे घर में बंधी देसी गाय से ही मिल जाती है। इसमें लागत बिल्कुल शून्य के बराबर होती है और हमारी मिट्टी दोबारा से जिंदा हो जाती है। आइए इस लेख में आपको बहुत ही आसान और सीधी भाषा में समझाता हूँ कि यह प्राकृतिक खेती कैसे की जाती है और इसके चार मुख्य काम क्या हैं।
प्राकृतिक खेती का सबसे पहला और सबसे जरूरी काम है अपने बीजों को सही तरीके से तैयार करना। हम बाजार से जो महंगे बीज लाते हैं, उन पर पहले से ही जहरीली दवाएं लगी होती हैं। लेकिन प्राकृतिक खेती में हम अपने घर के या आसपास के देसी बीजों का इस्तेमाल करते हैं जो हमारी जमीन और मौसम के हिसाब से सबसे अच्छे होते हैं।
इन बीजों को बोने से पहले बीजामृत से उपचारित किया जाता है। बीजामृत कोई बाजार की दवा नहीं है, बल्कि इसे हम देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, चूना और अपने खेत की मेड़ की साफ मिट्टी को मिलाकर खुद तैयार करते हैं।
जब हम अपने बीजों को इस बीजामृत के घोल में डुबोकर सुखाते हैं और फिर खेत में बोते हैं, तो बीज में कोई बीमारी नहीं लगती, उसका जमाव बहुत ही शानदार होता है और पौधे की जड़ें बहुत गहराई तक जाती हैं। इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा काम आता है फसल को खुराक देने का। हम सोचते हैं कि बिना यूरिया और डीएपी के फसल कैसे बड़ी होगी।
लेकिन किसान भाइयों, हमारी मिट्टी के अंदर पहले से ही पौधों के लिए सारी खुराक मौजूद है, बस वह खुराक ऐसे रूप में है जिसे पौधे सीधे नहीं खा सकते। उस खुराक को पौधों के लायक बनाने का काम मिट्टी में रहने वाले छोटे-छोटे जीव करते हैं। जब हम यूरिया डालते हैं तो ये जीव मर जाते हैं।
इन जीवों को वापस लाने और बढ़ाने के लिए हम प्राकृतिक खेती में जीवामृत का इस्तेमाल करते हैं। जीवामृत बनाने के लिए देसी गाय का गोबर, गोमूत्र, थोड़ा सा गुड़, थोड़ा सा बेसन और किसी पुराने बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे की एक मुट्ठी मिट्टी को पानी में मिलाकर कुछ दिनों के लिए सड़ाया जाता है।
जब यह जीवामृत तैयार हो जाता है और हम इसे सिंचाई के पानी के साथ या स्प्रे के रूप में खेत में डालते हैं, तो यह हमारी मिट्टी में करोड़ों की संख्या में काम करने वाले जीव पैदा कर देता है। ये जीव दिन-रात काम करके मिट्टी को भुरभुरा बनाते हैं और पौधों को सारी ताकत देते हैं।
तीसरी सबसे जरूरी बात जिसे हमें प्राकृतिक खेती में समझना है, वह है आच्छादन या जिसे अंग्रेजी में मल्चिंग कहते हैं। आप खुद सोचिये, क्या धरती माता को नंगा रहना पसंद है? जब हम खेत को खाली छोड़ देते हैं, तो तेज धूप से मिट्टी की नमी उड़ जाती है और उसके अंदर के जीव मर जाते हैं। इसलिए हमें अपनी मिट्टी को हमेशा ढक कर रखना चाहिए।
हम जो धान की पराली या गेहूं का फांस जला देते हैं, उसे जलाने की बजाय खेत में बिछा देना चाहिए। जब हम दो फसलों के बीच की खाली जगह को फसल के अवशेषों से ढक देते हैं, तो इससे कई बड़े फायदे होते हैं। पहला फायदा कि खेत में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और हमें बहुत कम पानी लगाना पड़ता है।
दूसरा फायदा कि खरपतवार या घास नहीं उग पाती, जिससे हमारी निराई-गुड़ाई की मेहनत और पैसा बचता है। और तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि जब यह पराली या अवशेष धीरे-धीरे गलते हैं, तो वे हमारी मिट्टी के लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन जैविक खाद बन जाते हैं। चौथी और आखिरी अहम बात है खेत में पानी का सही प्रबंध, जिसे हम प्राकृतिक खेती में व्हाप्सा कहते हैं।
हम अक्सर यह गलती करते हैं कि खेत में पानी भर-भर कर सिंचाई करते हैं। हमें लगता है कि ज्यादा पानी देने से फसल अच्छी होगी। लेकिन सच यह है कि पौधों की जड़ों को पानी में डूबना पसंद नहीं है। उन्हें पानी की नमी और हवा दोनों की जरूरत होती है।
जब हम खेत में जरूरत से ज्यादा पानी भर देते हैं, तो मिट्टी के अंदर की हवा बाहर निकल जाती है और पौधों का दम घुटने लगता है। प्राकृतिक खेती में हम आच्छादन करते हैं और बहुत हल्का पानी देते हैं जिससे मिट्टी में हवा और नमी का बहुत ही शानदार संतुलन बन जाता है। इसी संतुलन को व्हाप्सा कहा जाता है।
इससे पौधे बहुत तेजी से बढ़ते हैं और हमारी पानी की भी भारी बचत होती है। अब बात आती है कि अगर खेत में कीड़े लग जाएं या कोई बीमारी आ जाए तो हम क्या करें। प्राकृतिक खेती में कीड़ों को मारने के लिए जहरीले रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पहली बात तो यह है कि जब हमारी मिट्टी और पौधे स्वस्थ होते हैं, तो उनमें बीमारी वैसे ही बहुत कम लगती है।
फिर भी अगर कीड़ों का हमला हो, तो हम नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र या खट्टी छाछ जैसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं जिन्हें हम नीम के पत्तों, धतूरे, लहसुन, हरी मिर्च और गोमूत्र से अपने घर पर ही बिल्कुल मुफ्त में बना सकते हैं। ये प्राकृतिक दवाइयां हमारे मित्र कीटों को नहीं मारतीं, बल्कि सिर्फ दुश्मन कीड़ों को भगाती हैं और हमारी फसल पूरी तरह से सुरक्षित रहती है।
प्राकृतिक खेती की तरफ लौटना अब हमारी कोई मजबूरी नहीं है, बल्कि यह समय की सबसे बड़ी मांग है। जब हम रसायनों को छोड़कर गाय और प्रकृति के साथ मिलकर खेती करते हैं, तो हमारी पैदावार की गुणवत्ता इतनी अच्छी हो जाती है कि उस अनाज को खाने से बीमारियां दूर भागती हैं।
आज बाजार में जहर मुक्त अनाज, फल और सब्जियों की बहुत मांग है और लोग इसके लिए अच्छी कीमत देने को भी तैयार हैं। शुरुआत में आपको लग सकता है कि पैदावार थोड़ी कम हुई है, लेकिन जैसे-जैसे आपकी मिट्टी की ताकत वापस लौटेगी, आपकी पैदावार भी पहले से कहीं ज्यादा और बेहतर हो जाएगी।
आपका खेती का खर्चा लगभग खत्म हो जाएगा और आप कर्ज मुक्त होकर शान से जी सकेंगे।आप एक साथ पूरे खेत में यह बदलाव न करें, बल्कि शुरुआत में अपने खेत के एक छोटे से हिस्से, मान लीजिये एक बीघे या एक एकड़ में इसे जरूर आजमाकर देखें।
आपको खुद अपनी मिट्टी की महक और फसल की चमक में फर्क नजर आने लगेगा। मैं पूरी उम्मीद करता हूँ कि मेरी यह सीधी और सरल बात आप सभी भाइयों के दिल तक जरूर पहुँची होगी और आप इस प्राकृतिक तरीके को अपनाकर अपनी धरती माता को फिर से हरा-भरा और स्वस्थ बनाने में अपना योगदान जरूर देंगे।
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