गन्ने की मिठास के पीछे का सच: बीड की महिला मजदूरों का दर्द और किसानों की जिम्मेदारी

अभी हाल ही में महाराष्ट्र के बीड जिले से गन्ना काटने वाली मजदूर महिलाओं की जो खबर सामने आई है उसने मुझे एक किसान के तौर पर सोचने पर मजबूर कर दिया है। हम किसान दिन-रात मेहनत करके अपने खेतों में फसल उगाते हैं।

जब खेत में गन्ना लहलहाता है तो हमें लगता है कि हमारी मेहनत सफल हो गई लेकिन उस गन्ने की मिठास के पीछे कितनी कड़वी और दर्दनाक सच्चाई छिपी है यह जानकर रूह कांप जाती है। बीड जिले की सैकड़ों महिलाओं के गर्भाशय सिर्फ इसलिए निकाल दिए गए ताकि वे बिना किसी रुकावट के गन्ने की कटाई कर सकें।

एक किसान होने के नाते जब मैं अपने खेत में खड़ी फसल को देखता हूं तो अब मुझे उसमें उन मजदूर बहनों का दर्द दिखाई देता है। हम हमेशा अपनी फसल के दाम और मौसम की मार की बात करते हैं लेकिन उन हाथों की बात कभी नहीं करते जो हमारी फसल को खेत से निकालकर मिल तक पहुंचाते हैं।

आज मैं यह बात किसी नेता या अधिकारी के नजरिए से नहीं बल्कि एक उस किसान के नजरिए से है जिसके खेत में ये मजदूर आकर काम करते हैं। गन्ने की खेती कोई आसान काम नहीं है। इसे बोने से लेकर काटने तक बहुत मेहनत लगती है और इसका चक्र काफी लंबा होता है।

जब कटाई का सीजन आता है तो किसान चीनी मिलों की तरफ देखते हैं कि कब वहां से पर्ची आएगी और कब हमारे खेत की कटाई शुरू होगी। मिल वाले ठेकेदारों यानी मुकादम के जरिए मजदूरों की टोली किसानों के खेतों में भेजते हैं। बीड और उसके आस-पास के सूखाग्रस्त इलाकों से लाखों मजदूर हर साल अपना घर-बार छोड़कर गन्ना किसानों के खेतों में आते हैं।

इस पूरी व्यवस्था में पति और पत्नी को मिलाकर काम की एक इकाई माना जाता है जिसे वहां की भाषा में कोयता कहते हैं। ये गरीब मजदूर सीजन शुरू होने से पहले ठेकेदार से Advance Payment ले लेते हैं ताकि साल के बाकी महीनों में अपने परिवार का पेट पाल सकें और कर्ज चुका सकें। अब इस लिए हुए पैसे को चुकाने के लिए उन्हें दिन-रात गन्ने के खेतों में खटना पड़ता है।

दूसरी तरफ किसान भी चाहते हैं कि हमारा खेत जल्दी से खाली हो जाए ताकि किसान अगली फसल की तैयारी कर सकें। किसान का पूरा ध्यान सिर्फ Crop Management पर होता है कि कैसे जल्दी कटाई हो खेत खाली हो और फसल बिना सूखे मिल तक पहुंचे। इस जल्दबाजी और मुनाफे की दौड़ में किसान यह भूल जाते हैं कि जो लोग उनके खेत में काम कर रहे हैं वे इंसान हैं कोई लोहे की मशीन नहीं।

खेतों में काम करने की स्थितियां बहुत ही भयानक और अमानवीय होती हैं। ये मजदूर किसानों के खेतों के किनारे प्लास्टिक के टेंट या घास-फूस की छोटी सी झोपड़ी बनाकर महीनों तक रहते हैं। वहां न तो पीने के लिए साफ पानी होता है और न ही शौच के लिए कोई सुरक्षित जगह। गन्ना किसान भी कभी इस बात पर ध्यान नहीं देते कि हमारे खेत में काम करने वाली इन महिलाओं को बुनियादी सुविधाएं कैसे मिलेंगी। सुबह तीन या चार बजे उठकर ये महिलाएं पहले परिवार के लिए खाना बनाती हैं और फिर सूरज निकलने से पहले ही गन्ने के घने खेत में घुस जाती हैं। गन्ने की सूखी पत्तियां उनके हाथों और चेहरों को चीर देती हैं लेकिन वे लगातार हसिया चलाती रहती हैं। मुकादम का नियम बहुत सख्त होता है।

अगर कोई मजदूर एक दिन भी काम पर नहीं जाता है तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जाता है जो उनकी एक दिन की मजदूरी से कहीं ज्यादा होता है। ऐसे में महिलाओं के लिए अपनी शारीरिक परेशानियां जैसे माहवारी या गर्भावस्था एक बहुत बड़ी मुसीबत बन जाती हैं। अगर वे इन दर्द भरे दिनों में थोड़ा आराम करना चाहें तो ठेकेदार उनकी मजदूरी काट लेता है और उन्हें सबके सामने जलील किया जाता है।

यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया जो हर महिला के शरीर का एक अहम हिस्सा है उसे हमारे कृषि तंत्र में काम की एक रुकावट मान लिया गया है। खेतों में साफ-सफाई न होने और लगातार मिट्टी में काम करने के कारण इन महिलाओं को अक्सर भयानक इन्फेक्शन हो जाते हैं। जब पेट का दर्द बर्दाश्त से बाहर हो जाता है तो वे पास के किसी प्राइवेट क्लीनिक या अस्पताल में जाती हैं। यहीं से शोषण का एक नया और सबसे घिनौना खेल शुरू होता है। वहां बैठे डॉक्टर जिन्हें इन गरीब महिलाओं को सही Health Care देना चाहिए और आराम करने की सलाह देनी चाहिए वे उनके डर और मजबूरी का सीधा फायदा उठाते हैं। वे इन महिलाओं को डरा देते हैं कि अगर उन्होंने तुरंत अपना गर्भाशय नहीं निकलवाया तो भविष्य में उन्हें कैंसर हो जाएगा। ये बेचारी अनपढ़ महिलाएं जो पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबी हैं वे काम छूटने के डर से भारी कर्ज लेकर भी इस बड़े ऑपरेशन के लिए तैयार हो जाती हैं। वे मन ही मन सोचती हैं कि अगर शरीर का यह हिस्सा निकल जाएगा तो न माहवारी की छुट्टी लेनी पड़ेगी और न ही मुकादम की डांट सुननी पड़ेगी।

महज तीस से पैंतीस साल की उम्र में इन जवान महिलाओं का शरीर अंदर से पूरी तरह खोखला कर दिया जाता है ताकि वे बिना थके गन्ने का भारी गट्ठर अपने सिर पर ढो सकें। इस पूरी शोषणकारी व्यवस्था में हम किसान कहां खड़े हैं यह एक बहुत बड़ा सवाल है। क्या किसानों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।

किसान हमेशा अपनी फसल के ऊंचे दाम और High Yield के लिए सरकार से लड़ते हैं सड़कों पर उतरते हैं और आंदोलन करते हैं। लेकिन हमारे ही खेतों में हमारी ही आंखों के सामने जब इन महिलाओं का इतना बड़ा शोषण होता है तो किसान खामोश क्यों रहते हैं। सच तो यह है कि किसान भी अपनी आंखें बंद कर ली हैं।

अब किसानों को सिर्फ अपना काम निकलने और अपनी उपज बेचने से मतलब होता है। किसान अक्सर यह सोचकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह ठेकेदार और मजदूर के बीच का आपसी मामला है हमें इससे क्या लेना देना। लेकिन वह महिला हमारे ही खेत में काम कर रही है हमारी ही बोई हुई फसल काट रही है।

अगर वह बीमार है तो क्या एक इंसान के नाते हमारा यह पहला फर्ज नहीं है कि हम उसे पीने का साफ पानी और सुरक्षित महसूस करने की जगह दें। हमारी खेती कभी भी इतनी क्रूर और स्वार्थी नहीं थी। हमारे बुजुर्ग हमेशा कहते थे कि धरती हमारी माता है और खेती में सबका पेट भरने की एक पवित्र भावना होती है।

लेकिन आज हमारी खेती पूरी तरह से एक बेजान व्यापार बन गई है जहां इंसानी जान और महिलाओं के शरीर की कोई कीमत नहीं बची है। एक महिला के शरीर से उसका गर्भाशय निकाल देना कोई छोटी या मामूली बात नहीं है। इस क्रूर ऑपरेशन के बाद उन महिलाओं की जिंदगी सच में नर्क बन जाती है।

उनके शरीर में समय से पहले बुढ़ापा आ जाता है उनकी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और जोड़ों में हमेशा के लिए दर्द बैठ जाता है। जिस शरीर के बल पर वे अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए मजदूरी करने आई थीं वही शरीर हमेशा के लिए काम करने लायक नहीं रहता। यह सिर्फ एक मेडिकल लापरवाही की समस्या नहीं है।

बल्कि यह Labor Rights का हमारे देश में सबसे बड़ा और खुला उल्लंघन है। एक गरीब मजदूर को अपनी आजीविका कमाने के लिए अपने शरीर का अहम अंग कटवाना पड़े इससे ज्यादा शर्मनाक बात हमारे समाज के लिए और क्या हो सकती है। सरकारें आती हैं जांच कमेटियां बनाती हैं अखबारों में रिपोर्ट छपती हैं लेकिन जमीन पर सच्चाई जस की तस रहती है।

अगले साल फिर से गन्ने की कटाई का सीजन आएगा फिर से लाखों मजदूर अपना घर छोड़कर हमारे खेतों की तरफ आएंगे और फिर से किसी प्राइवेट अस्पताल में किसी मजबूर महिला का ऑपरेशन किया जा रहा होगा। जब तक इस पूरी कृषि व्यवस्था में इंसानियत को वापस नहीं लाया जाएगा तब तक ये सब बदस्तूर चलता रहेगा। हमें अपनी खेती के तरीकों और मजदूरों के प्रति अपने नजरिए को हर हाल में बदलना होगा।

हम सभी किसानों को आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जब भी कोई ठेकेदार हमारे खेत में मजदूरों को लेकर आए तो हमें यह तय करना चाहिए कि उनके रहने की जगह सुरक्षित और साफ हो। कम से कम खेत के एक कोने में महिलाओं के लिए एक अस्थायी शौचालय और नहाने की व्यवस्था तो हम किसान कर ही सकते हैं।

अगर कोई मजदूर महिला बीमार है तो किसान को ठेकेदार पर अपना प्रभाव डालकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह उस महिला को आराम दे और उसका कोई आर्थिक नुकसान न करे। हमारी खेती तभी सही मायनों में सफल है जब उसमें काम करने वाले हर इंसान के चेहरे पर सुकून और खुशी हो। हम धरती से सिर्फ अनाज और गन्ना नहीं उगाते बल्कि हम जीवन उगाते हैं।

और अगर उस जीवन को उगाने की प्रक्रिया में किसी बेबस मां या बहन की पूरी जिंदगी बर्बाद हो रही है तो ऐसी खेती का हमारे लिए कोई आध्यात्मिक या मानवीय फायदा नहीं है। आइए हम सब किसान मिलकर एक ऐसी पारदर्शी और संवेदनशील व्यवस्था की शुरुआत करें जहां खेतों में काम करने वाले मजदूरों का सम्मान हो महिलाओं को उनका बुनियादी अधिकार मिले और हमारे गन्ने की मिठास में किसी भी गरीब की जिंदगी का दर्द या खून न घुला हो।

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