आम के फलों में समय से पहले पीला पड़ना और सिकुड़ जाना आज किसानों के लिए एक गंभीर आर्थिक समस्या बनता जा रहा है। बदलती जलवायु परिस्थितियाँ, जैसे अत्यधिक तापमान, लू, अनियमित वर्षा और मिट्टी में नमी की कमी, इस समस्या को और बढ़ा रही हैं। जब फल विकास के समय तापमान 40°C से ऊपर चला जाता है।
और मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं रहती, तो पौधे में वॉटर स्ट्रेस पैदा होता है। इसका सीधा असर फल के आकार और गुणवत्ता पर पड़ता है, जिससे फल सिकुड़ने लगते हैं और समय से पहले पीले होकर गिर जाते हैं। इस समस्या का एक प्रमुख कारण जल प्रबंधन की कमी है। फल बनने के समय मिट्टी में लगातार नमी बनाए रखना जरूरी होता है।
यदि लंबे समय तक खेत सूखा रहता है तो पौधे की कोशिकाओं का विस्तार रुक जाता है, जिससे फल छोटे और सिकुड़े हुए बनते हैं। वहीं, ज्यादा पानी या जलभराव की स्थिति में जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिलती और पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता है। इसलिए संतुलित सिंचाई बेहद जरूरी है।
किसानों को 7 से 10 दिन के अंतराल पर गहरी सिंचाई करनी चाहिए और ड्रिप इरिगेशन अपनाने से 40 से 50% पानी की बचत के साथ बेहतर परिणाम मिलते हैं। साथ ही, मल्चिंग करने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है।
फफूंद जनित रोग भी इस समस्या का बड़ा कारण हैं। एन्थ्रेक्नोज (Anthracnose) में फल पर काले धब्बे बनते हैं और बाद में फल सिकुड़कर गिर सकता है।पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew) फूल और छोटे फलों पर सफेद परत बनाकर उनके विकास को रोक देता है। इन रोगों की रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम 0.1% या मैन्कोजेब 0.2% का छिड़काव करना चाहिए।
पाउडरी मिल्ड्यू के लिए हेक्साकोनाजोल 1 मिली/लीटर या वेटेबल सल्फर 2 ग्राम/लीटर का स्प्रे प्रभावी रहता है। साथ ही, मिट्टी में ट्राइकोडर्मा जैसे जैविक फफूंदनाशक का प्रयोग करने से रोग नियंत्रण में मदद मिलती है। पोषक तत्वों की कमी भी फल के सिकुड़ने और पीलेपन का एक महत्वपूर्ण कारण है।
बोरॉन की कमी से फल विकृत और कठोर हो जाते हैं, जिंक की कमी से पत्तियाँ छोटी और पीली पड़ जाती हैं, जबकि पोटाश की कमी से फल का आकार और गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसके लिए 0.2% बोरिक एसिड (2 ग्राम/लीटर) का स्प्रे फल सेट के समय करना चाहिए। जिंक की पूर्ति के लिए 0.5% जिंक सल्फेट (5 ग्राम/लीटर) + 2.5 ग्राम बुझा चूना मिलाकर छिड़काव करें।
पोटाश की पूर्ति के लिए 13:0:45 (पोटैशियम नाइट्रेट) का 5 ग्राम/लीटर पानी में घोल बनाकर स्प्रे करना बहुत लाभकारी होता है। कीट प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि थ्रिप्स और माइट्स जैसे कीट फल का रस चूसकर उसे कमजोर कर देते हैं, जबकि फ्रूट फ्लाई फल के अंदर लार्वा विकसित करके उसे पूरी तरह खराब कर देती है।
इसके नियंत्रण के लिए प्रति एकड़ 10 से 15 मिथाइल यूजेनॉल ट्रैप लगाना चाहिए। साथ ही, नीम आधारित कीटनाशक जैसे एजाडिरैक्टिन 1500 ppm का 2 से 3 मिली/लीटर की दर से छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर ही रासायनिक दवाओं का प्रयोग करें ताकि फल में अवशेष कम रहें। हार्मोनल असंतुलन भी फल गिरने और सिकुड़ने का एक कारण है।
इसे नियंत्रित करने के लिए प्लानोफिक्स (NAA 4.5%) का 1 मिली/3 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। इससे फल गिरना कम होता है और फल का विकास बेहतर होता है। इसके अलावा 2,4-D का 10 ppm घोल सावधानीपूर्वक उपयोग करने से फल धारण क्षमता बढ़ती है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए कुछ विशेष उपाय भी अपनाने चाहिए।
तेज गर्मी से बचाव के लिए 3% काओलिन (30 ग्राम/लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए, जिससे पत्तियों पर एक सुरक्षात्मक परत बन जाती है और वाष्पोत्सर्जन कम होता है। छोटे पौधों के लिए शेड नेट का उपयोग किया जा सकता है और हवा से बचाव के लिए खेत के चारों ओर पेड़ों की कतार लगाना लाभकारी होता है। स्वच्छता और नियमित निगरानी भी बहुत जरूरी है।
बाग में गिरे हुए और संक्रमित फलों को तुरंत हटाकर नष्ट करें, ताकि रोग और कीट का प्रसार न हो। सप्ताह में कम से कम एक बार बाग का निरीक्षण जरूर करें, जिससे समस्या की पहचान शुरुआती अवस्था में ही हो सके और समय पर नियंत्रण किया जा सके। आम के फलों में पीलेपन और सिकुड़न की समस्या एक ही कारण से नहीं होती, बल्कि कई कारकों का संयुक्त प्रभाव होती है।
यदि किसान संतुलित सिंचाई, सही पोषण, समय पर कीट एवं रोग नियंत्रण और आधुनिक तकनीकों जैसे ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग को अपनाते हैं, तो इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। सही समय पर सही निर्णय लेने से न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि फल की गुणवत्ता भी बेहतर होगी, जिससे बाजार में अच्छा दाम मिलेगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी।
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