गेहूं में फॉस्फोरस दिया है तो धान में जरूरत नहीं: संधू

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विज्ञान केंद्र फिरोजपुर ने किसानों के बीच उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग और संतुलित पोषण को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष जागरूकता शिविर का आयोजन किया। इस शिविर का मुख्य उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक खेती से जोड़ना और खेती की बढ़ती लागत को कम करना था।

शिविर के दौरान विशेषज्ञों ने मिट्टी की सेहत सुधारने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। उपनिदेशक डॉ. गुरमेल सिंह संधू ने किसानों को सलाह दी कि वे धान और बासमती की ऐसी किस्में अपनाएं जो कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं। इससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि पानी और खाद जैसे संसाधनों का भी बेहतर उपयोग होगा।

डॉ. संधू ने उर्वरकों के सही इस्तेमाल के लिए मिट्टी परीक्षण को सबसे जरूरी बताया। उन्होंने जानकारी दी कि केवीके की प्रयोगशाला में मिट्टी और पानी की जांच की सुविधा उपलब्ध है। किसानों को अपनी जमीन की जरूरत के अनुसार ही खाद डालनी चाहिए ताकि फिजूलखर्ची से बचा जा सके।

पोषक तत्व प्रबंधन पर एक बहुत ही महत्वपूर्ण सलाह देते हुए डॉ. संधू ने कहा कि यदि किसान अपनी गेहूं की फसल में फॉस्फोरस की अनुशंसित मात्रा दे चुके हैं, तो उन्हें धान की फसल में दोबारा इसे डालने की आवश्यकता नहीं है। यह छोटी सी सावधानी किसानों की लागत में बड़ी कटौती कर सकती है।

शिविर में जैविक खेती के महत्व को भी रेखांकित किया गया। किसानों को गोबर की खाद, हरी खाद और जैव उर्वरकों के नियमित उपयोग के लिए प्रेरित किया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, इससे न केवल मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है, बल्कि उसकी भौतिक संरचना में भी सुधार होता है।

वैज्ञानिक डॉ. दिव्या ने कीटनाशकों और उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग के खतरों के प्रति किसानों को सचेत किया। उन्होंने बताया कि रसायनों का बेतहाशा इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता तो खराब करता ही है, साथ ही पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर संकट पैदा कर रहा है।

कार्यक्रम के अंत में किसानों से केवल अनुशंसित मात्रा और सुरक्षा मानकों का पालन करने की अपील की गई। यह पहल दर्शाती है कि कैसे वैज्ञानिक मार्गदर्शन के जरिए किसान अपनी खेती को अधिक किफायती, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बना सकते हैं।

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