किसानों के लिए सुनने में यह फैसला सही लगता है कि सरकार उर्वरक बिक्री को नियंत्रित करेगी और जरूरत के हिसाब से खाद देगी, लेकिन एक किसान के नजरिए से देखें तो इसमें जितनी उम्मीद है, उतनी ही चिंता भी छिपी हुई है।
क्योंकि जमीन पर खेती करने वाला किसान जानता है कि हर खेत, हर फसल और हर मौसम अलग होता है, उसे किसी तय फॉर्मूले में बांधना इतना आसान नहीं है। सरकार जो ‘नेशनल फ्रेमवर्क’ ला रही है, उसमें कहा जा रहा है कि अब खाद जमीन और फसल के आधार पर मिलेगी।मतलब एक तरह से यह तय होगा कि किसान कितना यूरिया या डीएपी खरीद सकता है।
शुरुआत में पांच-छह बैग प्रति हेक्टेयर की बात हो रही है। यहां पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या सरकार यह मानकर चल रही है कि पूरे देश के सभी खेत एक जैसे हैं? कहीं मिट्टी कमजोर है, कहीं सालों से खेती के कारण पोषक तत्व खत्म हो चुके हैं, कहीं पानी की कमी है, तो कहीं ज्यादा नमी है। ऐसे में एक तय मात्रा कैसे हर किसान पर लागू की जा सकती है।
किसान की असली समस्या यह है कि वह पहले ही बाजार और मौसम के बीच फंसा हुआ है। अब अगर खाद पर भी नियंत्रण आ गया, तो उसकी स्वतंत्रता और कम हो जाएगी। कई बार ऐसा होता है कि फसल की हालत देखकर किसान को अतिरिक्त खाद देने की जरूरत पड़ती है। अगर सिस्टम उसे रोक देगा, तो नुकसान सीधे फसल पर पड़ेगा और आखिर में किसान की आमदनी पर असर आएगा।
सरकार का तर्क है कि इससे खाद का सही उपयोग होगा और बर्बादी रुकेगी। यह बात कुछ हद तक सही भी है, क्योंकि आज कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा यूरिया डाला जा रहा है। लेकिन इसका समाधान पूरी तरह नियंत्रण नहीं हो सकता, बल्कि जागरूकता और सही सलाह होनी चाहिए। अगर किसान को सही तरीके से बताया जाए कि कितनी खाद कब और कैसे देनी है, तो वह खुद संतुलन बना सकता है।
दूसरी बड़ी चिंता यह है कि यह पूरा सिस्टम डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ा होगा, जैसे IFMS और जमीन के रिकॉर्ड। अब गांव के स्तर पर देखें तो अभी भी बहुत सारे किसानों के रिकॉर्ड सही नहीं हैं, कई जगह जमीन बंटवारे के बावजूद कागज अपडेट नहीं हुए हैं। ऐसे में अगर सिस्टम जमीन के रिकॉर्ड के आधार पर खाद देगा, तो कई किसानों को परेशानी हो सकती है।
खासकर छोटे और किराए पर खेती करने वाले किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। हरियाणा और तेलंगाना में पायलट प्रोजेक्ट के आंकड़े दिखाते हैं कि खाद की खपत कम हुई और सब्सिडी में बचत हुई। लेकिन एक किसान के लिए यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है कि क्या इससे उसकी पैदावार बढ़ी या कम हुई। अगर सिर्फ खपत कम करने को ही सफलता माना जाएगा, तो यह अधूरी तस्वीर होगी।
वैश्विक स्तर पर जो हालात बन रहे हैं, जैसे उर्वरकों की कमी, कीमतों में बढ़ोतरी और आयात पर निर्भरता, यह सब सही है। किसान भी समझता है कि देश पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। लेकिन इसका समाधान यह नहीं होना चाहिए कि बोझ किसान पर डाल दिया जाए। अगर सप्लाई में दिक्कत है, तो सरकार को वैकल्पिक स्रोत, घरेलू उत्पादन और लॉन्ग टर्म प्लान पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर खाद सीमित कर दी जाएगी, तो काला बाजारी बढ़ने का खतरा भी रहेगा। पहले भी हमने देखा है कि जब भी किसी चीज पर ज्यादा नियंत्रण होता है, तो बाजार में उसका गलत फायदा उठाया जाता है। छोटे किसान फिर महंगे दाम पर खाद खरीदने को मजबूर हो सकते हैं। जैसे अभी गैस की कलाकारी देख सकते हैं।
असल जरूरत यह है कि सरकार संतुलन बनाए। नियंत्रण हो, लेकिन लचीलापन भी हो। किसान को पूरी तरह बांधने के बजाय उसे विकल्प दिए जाएं। जैसे मिट्टी परीक्षण को बढ़ावा देना, जैविक खाद को प्रोत्साहन देना, और सही समय पर सही सलाह देना। अगर यह सब साथ में किया जाए, तो ही यह योजना सफल हो सकती है। किसान चाहता है कि उसकी लागत कम हो, उत्पादन बढ़े और उसे सही दाम मिले।
अगर कोई भी नीति इन तीनों चीजों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है, तो वह किसान के लिए फायदेमंद होती है। लेकिन अगर सिर्फ नियंत्रण और बचत पर फोकस होगा, तो इसका असर उल्टा भी पड़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि सरकार इस फ्रेमवर्क को लागू करने से पहले किसानों से फीडबैक ले, जमीनी सच्चाई को समझे और फिर ऐसा मॉडल बनाए जो किसान के लिए मददगार हो, न कि बोझ।
क्योंकि आखिर में खेती कागजों से नहीं, खेत में पसीना बहाकर होती है। अगर आप भी किसान हैं या खेती से जुड़े हैं, तो इस नए नियम पर अपनी राय जरूर रखें। क्या यह फैसला सही है या इससे परेशानी बढ़ेगी? अपनी बात कमेंट में जरूर लिखें।
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