गुजरात सरकार ने कृषि प्रशासन को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा डिजिटल कदम उठाया है। अब राज्य के किसानों के लिए ‘एग्रीस्टैक’ के तहत किसान रजिस्ट्री में नामांकन करना अनिवार्य कर दिया गया है।
इस नई व्यवस्था को सीधे पीएम-किसान योजना से जोड़ दिया गया है, जिसका मतलब है कि जो किसान इस रजिस्ट्री का हिस्सा नहीं बनेंगे, उन्हें भविष्य में मिलने वाली सरकारी किस्तों का लाभ नहीं मिल पाएगा। इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य आकर्षण प्रत्येक किसान को मिलने वाली 12 अंकों की एक अनूठी “फार्मर आईडी” है।
यह आईडी न केवल एक डिजिटल पहचान के रूप में काम करेगी, बल्कि सरकारी लाभों के वितरण में पारदर्शिता भी लाएगी। सरकार का उद्देश्य इसके जरिए डेटा के दोहराव (डुप्लीकेशन) को रोकना है ताकि वित्तीय सहायता सही और हकदार किसान तक ही पहुंचे। यह पहल असल में एक एकीकृत डिजिटल किसान डेटाबेस तैयार करने की बड़ी योजना का हिस्सा है।
भूमि रिकॉर्ड और पहचान डेटा को एक साथ जोड़ने से सब्सिडी, फसल खरीद और खाद-बीज के वितरण जैसी योजनाओं को अधिक सटीक और प्रभावी बनाया जा सकेगा। इससे सरकारी सहायता सीधे किसानों के बैंक खातों में बिना किसी देरी के पहुंचना सुनिश्चित होगा। पंजीकरण के लिए किसानों को कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज और विवरण साझा करने होंगे।
इसमें आधार विवरण, आधार से जुड़ा सक्रिय मोबाइल नंबर और भूमि रिकॉर्ड से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज जैसे 7/12 और 8-A शामिल हैं। नामांकन की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए ग्राम स्तर के ऑपरेटरों, जन सेवा केंद्रों और आधिकारिक पोर्टल व मोबाइल ऐप की मदद ली जा सकती है।
वर्तमान में सरकार ने राजकोट जैसे प्रमुख जिलों में बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान शुरू कर दिए हैं। अधिकारियों का प्रयास है कि किसान समयसीमा के भीतर अपना पंजीकरण पूरा कर लें ताकि उनकी वित्तीय सहायता में कोई तकनीकी बाधा न आए। यह “डिजिटल फर्स्ट” दृष्टिकोण कृषि क्षेत्र में एक बड़े प्रशासनिक बदलाव का संकेत दे रहा है।
हालांकि, इस डिजिटल बदलाव के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे अंतिम छोर तक कैसे लागू किया जाता है। विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए, जिनके पास डिजिटल संसाधनों की कमी हो सकती है, इस प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाए रखना सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।
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