एक किसान के रूप में जब हम यह खबर सुनते हैं कि यूरिया की कीमतें अचानक इतनी तेजी से बढ़ गई हैं, तो सबसे पहले दिमाग में यही सवाल आता है कि इसका सीधा असर हमारी खेती पर क्या पड़ेगा।
अभी जो जानकारी सामने आई है कि सरकार के लिए यूरिया आयात करने वाली एजेंसी Indian Potash Limited को इस बार जरूरत से कहीं ज्यादा ऑफर मिले हैं, यह एक तरफ तो राहत की बात लगती है कि सप्लाई की कमी नहीं है, लेकिन दूसरी तरफ बढ़ी हुई कीमतें चिंता बढ़ा देती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 4 अप्रैल को लगभग 2.5 मिलियन टन यूरिया की मांग रखी गई थी।
लेकिन करीब 6 मिलियन टन के ऑफर आए। इसका मतलब है कि वैश्विक बाजार में यूरिया उपलब्ध तो है, लेकिन इसकी कीमतें बहुत ज्यादा हो चुकी हैं। जब पश्चिमी तट के लिए करीब 935 डॉलर प्रति टन और पूर्वी तट के लिए 959 डॉलर प्रति टन तक के रेट सामने आते हैं, तो यह साफ संकेत है कि बाजार में बड़ा उतार-चढ़ाव चल रहा है।
अगर हम इसे एक किसान की नजर से देखें, तो यह स्थिति थोड़ी डराने वाली है। फरवरी में यही यूरिया 508 से 512 डॉलर प्रति टन के आसपास मिल रहा था, और अब दो महीने में ही लगभग 80% की बढ़ोतरी हो गई है। इतनी तेज़ वृद्धि का मतलब है कि या तो सरकार को ज्यादा सब्सिडी देनी पड़ेगी, या फिर भविष्य में इसका बोझ कहीं न कहीं किसानों पर आ सकता है।
किसानों के लिए यूरिया केवल एक खाद नहीं है, बल्कि यह किसानों की फसल की रीढ़ है। खासकर धान, गेहूं और मक्का जैसी फसलों में इसका उपयोग बहुत अधिक होता है। अगर इसकी कीमत बढ़ती है या उपलब्धता में कोई समस्या आती है, तो इसका सीधा असर उत्पादन और लागत दोनों पर पड़ता है। कई छोटे किसान पहले ही बढ़ती लागत से परेशान हैं, ऐसे में यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण बन सकती है।
हालांकि सरकार आमतौर पर यूरिया की खुदरा कीमत को नियंत्रित रखती है, ताकि किसानों को ज्यादा बोझ न झेलना पड़े। लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें इतनी तेजी से बढ़ती हैं, तो सरकार पर सब्सिडी का दबाव बढ़ जाता है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में खाद सब्सिडी का बजट भी बढ़ सकता है या फिर कुछ नीतिगत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत अभी भी यूरिया उत्पादन के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। कच्चे माल जैसे प्राकृतिक गैस (LNG) की कीमतें भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी होती हैं। अगर वहां कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर सीधे खाद की लागत पर पड़ता है। इसलिए यह केवल यूरिया की कीमत का मामला नहीं है, बल्कि पूरी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
किसान के रूप में हमें इस स्थिति से घबराने की बजाय समझदारी से काम लेना होगा। सबसे पहले हमें उर्वरकों का संतुलित उपयोग करना चाहिए। अक्सर किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया डाल देते हैं, जिससे न केवल लागत बढ़ती है बल्कि मिट्टी की सेहत भी खराब होती है। अगर किसान मृदा परीक्षण के आधार पर खाद का उपयोग करें, तो कम मात्रा में भी बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
इसके साथ ही किसानों को वैकल्पिक उपायों पर भी ध्यान देना चाहिए, जैसे जैविक खाद, गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट और बायो फर्टिलाइजर का उपयोग। इससे किसानों की निर्भरता रासायनिक उर्वरकों पर कम होगी और लागत भी नियंत्रित रहेगी। आजकल सरकार भी नैनो यूरिया जैसे विकल्पों को बढ़ावा दे रही है, जो कम मात्रा में ज्यादा प्रभाव देता है।
एक और महत्वपूर्ण कदम यह है कि किसान खेती में इंटीग्रेटेड न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट अपनाएं। यानी रासायनिक, जैविक और प्राकृतिक सभी प्रकार के पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग करें। इससे न केवल लागत कम होगी बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी लंबे समय तक बनी रहेगी। एक किसान के तौर पर मैं यही कहना चाहूंगा कि बाजार की परिस्थितियां हमारे हाथ में नहीं होती,
लेकिन हम अपनी खेती के तरीके जरूर बदल सकते हैं। अगर हम समय रहते जागरूक हो जाएं और सही तकनीकों को अपनाएं, तो इस तरह की महंगाई का असर काफी हद तक कम किया जा सकता है।
आज जरूरत है समझदारी से खेती करने की, ताकि बढ़ती लागत के बीच भी किसान अपनी आय को सुरक्षित रख सकें। आने वाला समय चुनौतियों से भरा हो सकता है, लेकिन सही जानकारी और सही निर्णय से किसान इन चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।
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