अब खुले बाजार में फसल बेचने पर भी मिलेगी किसानों को 100% एमएसपी की गारंटी

केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी प्रणाली को अधिक प्रभावी और लचीला बनाने के लिए एक बड़ा प्रयोग शुरू किया है। पीएम-आशा योजना के तहत ‘भावांतर भुगतान मॉडल’ का पायलट परियोजना की शुरुआत की गई है।

इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसानों को खुले बाजार में एमएसपी से कम कीमत मिलती है, तो भी उनकी कुल आय एमएसपी के स्तर तक बनी रहे। यह महत्वपूर्ण परीक्षण फिलहाल दक्षिण भारत के दो राज्यों, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में शुरू किया गया है।

इस व्यवस्था के अंतर्गत, यदि कोई किसान अपनी उपज को घोषित एमएसपी से कम दाम पर बेचता है, तो बिक्री मूल्य और एमएसपी के बीच के अंतर की भरपाई सरकार करेगी। यह मुआवजा राशि सीधे लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से किसान के बैंक खाते में जमा कर दी जाएगी।

इस प्रक्रिया को एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए कि किसी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 7,500 रुपये प्रति क्विंटल तय है, लेकिन बाजार की स्थितियों के कारण किसान उसे केवल 6,500 रुपये में ही बेच पाता है। ऐसी स्थिति में, सरकार 1,000 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर सीधे किसान के खाते में भेजेगी, जिससे उसे प्रभावी रूप से पूरे 7,500 रुपये मिल जाएंगे।

यह मॉडल पारंपरिक खरीद व्यवस्था से काफी अलग है क्योंकि इसमें सरकार को भौतिक रूप से अनाज खरीदने और उसका भंडारण करने की आवश्यकता नहीं होती। इससे किसानों को यह आजादी मिलती है कि वे मंडियों और सरकारी खरीद केंद्रों के दबाव से मुक्त होकर अपनी फसल कहीं भी बेच सकें। साथ ही, इससे सरकारी मशीनरी पर अनाज के उठाव और सुरक्षा का बोझ भी काफी कम हो जाएगा।

इस योजना का लाभ लेने के लिए कुछ बुनियादी नियम भी तय किए गए हैं। किसानों को अनिवार्य रूप से ‘e-crop’ सिस्टम पर अपनी फसल का पंजीकरण कराना होगा। इसके अलावा, मुआवजा प्राप्त करने के लिए अधिसूचित मंडियों से मिली आधिकारिक बिक्री रसीद जमा करनी होगी। सरकार इस पायलट परियोजना की सफलता के आधार पर इसे भविष्य में अन्य राज्यों और फसलों के लिए एक राष्ट्रीय मॉडल के रूप में देख रही है।

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