दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता और कम लागत में बंपर मुनाफे की दिशा में अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। इक्रिसैट के 3 वर्षों के वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, अरहर (तुअर) की परंपरागत सीधी बुवाई के बजाय नर्सरी तैयार कर पौध रोपण (Transplanting) करने से पैदावार में 20 प्रतिशत से लेकर अनुकूल परिस्थितियों में 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
ओडिशा में हुए परीक्षणों से साबित हुआ है कि इस तकनीक से फसल की अवधि 12 से 18 दिन घटती है और दाने की चमक भी सुधरती है। जानिए इस आधुनिक रोपण तकनीक का पूरा वैज्ञानिक गणित।
रोपाई से अरहर में 20% तक अधिक पैदावार
अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान इक्रिसॅट के अध्ययन से पता चला है कि अरहर यानी तुअर की सीधी बुवाई के बजाय पौध रोपण यानी ट्रांसप्लांटिंग अपनाने से पैदावार में 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की जा सकती है। तीन वर्षों तक चले इस शोध में यह भी सामने आया कि यह विधि फसल की अवधि को 12 से 18 दिन तक कम करती है और दाने की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार लाती है।
8 क्विंटल के मुकाबले 25 से 30 क्विंटल उत्पादन
ओडिशा में विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में किए गए परीक्षणों में रोपित पौधों ने मजबूत जड़ प्रणाली विकसित की, पोषक तत्वों का बेहतर अवशोषण किया और मौसमीय तनाव के प्रति अधिक सहनशीलता दिखाई। शोधकर्ताओं के अनुसार, परंपरागत बुवाई में जहां औसत उत्पादन 8 से 9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहता है, वहीं अनुकूल परिस्थितियों में रोपण पद्धति से 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन संभव हुआ।
अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में क्रांति लाएगी रोपाई तकनीक
इक्रिसॅट के महानिदेशक हिमांशु पाठक ने कहा कि यह तकनीक किसान हितैषी है और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में उत्पादकता और आय बढ़ाने के लिए इसे देशभर में प्रोत्साहित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस पद्धति से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि फसल अवधि कम होने से जोखिम भी घटेगा और किसानों को जल्दी बाजार उपलब्ध होगा।
किसान कैसे अपनाएं यह तकनीक
किसान भाइयों, अरहर की रोपाई विधि न केवल बीज की बचत करती है, बल्कि यह प्रतिकूल मौसम में भी फसल को सुरक्षा देती है। अगर आप पारंपरिक खेती से हटकर इस आधुनिक तकनीक को अपनाते हैं, तो 20 प्रतिशत तक की अतिरिक्त पैदावार आपके घर की खुशहाली बढ़ा सकती है। याद रखें, सही समय पर नर्सरी और सही दूरी ही इस सफलता की कुंजी है।
अरहर रोपण तकनीक से किसानों को मिलने वाले 3 बड़े लाभ
फसल अवधि 12 से 18 दिन घटी: रोपाई तकनीक से फसल लगभग दो से तीन हफ्ते पहले पककर तैयार हो जाती है। इससे फसल को पाले या अंतिम दिनों के सूखे से बचाया जा सकता है और किसान रबी की अगली फसल (गेहूं/चना) की बुवाई सही समय पर कर सकते हैं।
सूखे और जल-तनाव से सुरक्षा: चूंकि नर्सरी में पौधे 3 से 4 हफ्ते तक सुरक्षित वातावरण में जड़ पकड़ लेते हैं, इसलिए मुख्य खेत में रोपाई के बाद उनकी जड़ें तेजी से जमीन की गहराई में जाकर नमी खींचती हैं।
कम बीज में ज्यादा शाखाएं: रोपाई विधि में पौधों को उचित दूरी (कम से कम 3 से 4 फीट) पर लगाया जाता है, जिससे पौधे को पर्याप्त धूप-हवा मिलती है और एक ही पौधे में 50 से 70 तक मजबूत फलियां देने वाली शाखाएं (Canopy) फूटती हैं।
निष्कर्ष: देश में दालों की बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अरहर की पारंपरिक सीधी बुवाई के ढर्रे को बदलना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय संस्थान इक्रिसैट का यह तीन वर्षीय शोध साबित करता है कि आधुनिक पौध रोपण (Transplanting) तकनीक अपनाकर किसान न केवल बीज बचा सकते हैं और फसल की अवधि 12 से 18 दिन घटा सकते हैं, बल्कि अपनी पैदावार को 8 क्विंटल से बढ़ाकर 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के स्तर तक ले जा सकते हैं।
समय पर नर्सरी तैयार करना, सही दूरी पर रोपाई और संतुलित पोषण प्रबंधन ही दलहन उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर और किसानों को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने का वास्तविक मार्ग है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. अरहर की रोपाई (Transplanting) तकनीक क्या है?
उत्तर: इस तकनीक में अरहर के बीजों को सीधे खेत में बोने के बजाय पहले पॉलीबैग या नर्सरी ट्रे में 20 से 25 दिन तक स्वस्थ पौध तैयार की जाती है, और फिर बारिश शुरू होने पर मुख्य खेत में उचित दूरी पर रोपा जाता है।
Q2. इक्रिसैट (ICRISAT) के अध्ययन में रोपाई विधि से उत्पादन कितना आंका गया?
उत्तर: इक्रिसैट के 3 वर्षों के शोध के अनुसार, जहां सीधी बुवाई में औसत उत्पादन 8-9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहता है, वहीं रोपाई विधि से अनुकूल परिस्थितियों में 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दर्ज किया गया।
Q3. क्या रोपाई करने से अरहर के पकने का समय कम होता है?
उत्तर: हाँ, शोध में पाया गया कि रोपाई अपनाने से अरहर की फसल पकने की कुल अवधि 12 से 18 दिन तक कम हो जाती है, जिससे किसान अगली रबी फसल की बुवाई समय पर कर सकते हैं।
Q4. ओडिशा के परीक्षणों में पौधों पर क्या सकारात्मक प्रभाव देखा गया?
उत्तर: ओडिशा के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में रोपित पौधों ने अधिक मजबूत व गहरी जड़ें विकसित कीं, पोषक तत्वों का अवशोषण सुधरा और मौसम के सूखे तनाव के प्रति अधिक सहनशीलता दिखाई।
Q5. इक्रिसैट के महानिदेशक का इस तकनीक पर क्या कहना है?
उत्तर: महानिदेशक ने इसे किसान हितैषी तकनीक बताते हुए कहा कि इससे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ेगी, फसल का जोखिम घटेगा और इसे देश भर में बढ़ावा दिया जाएगा।
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