सच कहूं तो जब ऐसी खबर सामने आती है कि सैकड़ों करोड़ का गेहूं सड़ गया, तो एक किसान के मन में सबसे पहले गुस्सा नहीं, बल्कि दर्द उठता है। हम खेत में दिन-रात मेहनत करते हैं, मौसम से लड़ते हैं, कभी सूखा तो कभी बारिश झेलते हैं, तब जाकर एक-एक दाना पैदा होता है। और वही अनाज अगर गोदामों में सड़ जाए, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि किसानों की मेहनत का अपमान है।
दैनिक भास्कर में छपी इस खबर के मुताबिक दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि शिवराज सिंह चौहान के प्रभाव वाले क्षेत्र में करीब 100 करोड़ रुपय का गेहूं खराब हो गया। एक किसान के नजरिए से देखें तो यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारी व्यवस्था की बड़ी नाकामी को दिखाता है।
हम किसान जब अपनी फसल मंडी में बेचते हैं, तो कई बार हमें सही दाम नहीं मिलता। कई बार नमी के नाम पर कटौती होती है, कई बार खरीद ही देर से होती है। लेकिन सरकार और अधिकारी हमेशा कहते हैं कि भंडारण की पूरी व्यवस्था है, अनाज सुरक्षित रखा जाएगा।
अगर सच में ऐसा है, तो फिर इतनी बड़ी मात्रा में गेहूं सड़ कैसे गया? इसका मतलब साफ है कि जमीन पर जो व्यवस्था है, वह कागजों से बिल्कुल अलग है। सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब खबर में यह सामने आता है कि सालों तक अनाज उठाया ही नहीं गया।
एक किसान के लिए एक दिन भी फसल को खुले में रखना जोखिम होता है, और यहां 4 से 5 साल तक अनाज पड़ा रहा और किसी ने ध्यान नहीं दिया। यह सिर्फ गलती नहीं, बल्कि गंभीर लापरवाही है। अगर समय पर उठाव होता, सही भंडारण होता, तो यह नुकसान नहीं होता।
किसानों को अक्सर यह कहा जाता है कि तकनीक अपनाओ, आधुनिक बनो, फसल का सही प्रबंधन करो। लेकिन क्या सरकार और सिस्टम खुद अपने स्तर पर उतना ही जिम्मेदार है? अगर गोदामों में अनाज सुरक्षित नहीं रह सकता, तो फिर किसानों से उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे हर बार परफेक्ट उत्पादन करें।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है? क्या सिर्फ जांच की बात करके मामला खत्म कर दिया जाएगा, या फिर वास्तव में दोषियों पर कार्रवाई होगी? किसान अब सिर्फ आश्वासन नहीं चाहता, उसे परिणाम चाहिए।
क्योंकि यह नुकसान सिर्फ सरकार का नहीं है, यह देश के अन्न का नुकसान है, यह हमारे खून-पसीने की कमाई का नुकसान है। एक और बात जो किसान को परेशान करती है, वह यह है कि जब फसल खराब होती है तो किसान को मुआवजा पाने के लिए महीनों चक्कर लगाने पड़ते हैं।
लेकिन जब इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी स्तर पर अनाज खराब होता है, तो क्या उतनी ही सख्ती से जवाबदेही तय होती है? यही दोहरा मापदंड किसानों को अंदर से तोड़ता है। अगर सही मायनों में सुधार करना है, तो सबसे पहले भंडारण व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
गांव स्तर पर छोटे-छोटे गोदाम, वैज्ञानिक स्टोरेज और समय पर उठाव सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी इतनी बड़ी लापरवाही करने की हिम्मत न कर सके।
आज जरूरत है कि इस तरह की घटनाओं को सिर्फ खबर बनाकर न छोड़ा जाए, बल्कि इससे सीख लेकर सिस्टम को सुधारा जाए। क्योंकि अगर अन्न ही सुरक्षित नहीं रहेगा, तो किसान का भरोसा भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा।
अगर आप भी एक किसान हैं या खेती से जुड़े हैं, तो इस मुद्दे पर अपनी राय जरूर साझा करें। ऐसे मामलों पर आवाज उठाना जरूरी है ताकि किसानों की मेहनत की सही कीमत और सम्मान मिल सके।
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