गांव के स्तर पर देखा जाए तो यह फैसला किसानों के लिए राहत देने वाला जरूर है, लेकिन इसके पीछे की असली स्थिति को समझना भी जरूरी है। पहले जब फार्मर रजिस्ट्रेशन अनिवार्य था, तब छोटे और कम पढ़े-लिखे किसानों को काफी दिक्कत होती थी।
कई किसान समय पर रजिस्ट्रेशन नहीं करा पाते थे, कोई दस्तावेज अधूरे रह जाते थे, तो कोई ऑनलाइन प्रक्रिया समझ नहीं पाता था। ऐसे में मजबूरी में उन्हें अपना गेहूं व्यापारियों या बिचौलियों को कम दाम पर बेचना पड़ता था। अब बिना रजिस्ट्रेशन के सीधे क्रय केंद्र पर बेचने की सुविधा मिलने से इन किसानों को राहत जरूर मिलेगी।
लेकिन किसानों के नजरिए से एक बड़ी चिंता अभी भी बनी हुई है, और वह है खरीद की वास्तविक व्यवस्था। कागज पर नियम आसान हो गया, लेकिन जमीन पर अगर केंद्र पर लंबी लाइन, तौल में देरी, या भुगतान में देरी होगी, तो किसान को फायदा सीमित ही मिलेगा। कई बार ऐसा देखा गया है कि किसान ट्रॉली लेकर 2 से 3 दिन तक क्रय केंद्र के बाहर खड़ा रहता है, जिससे समय और पैसा दोनों का नुकसान होता है। ऐसे में किसान यही चाहता है कि सिर्फ नियम ही नहीं, बल्कि व्यवस्था भी मजबूत हो।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकतर छोटे किसान अपनी उपज जल्दी बेचने के दबाव में रहते हैं। उनके पास भंडारण की सुविधा नहीं होती, न ही इतना पूंजी होता है कि वह इंतजार कर सकें। ऐसे में जब उन्हें सीधे केंद्र पर बेचने का मौका मिलेगा, तो वे तुरंत अपनी उपज बेचकर नकद जरूरतें पूरी कर पाएंगे।
इससे उन्हें साहूकार या उधार के चक्र से भी कुछ हद तक राहत मिल सकती है। हालांकि, कुछ किसान यह भी मानते हैं कि अगर रजिस्ट्रेशन पूरी तरह खत्म कर दिया गया तो भविष्य में डेटा और पारदर्शिता की समस्या आ सकती है। रजिस्ट्रेशन का एक फायदा यह था कि सरकार के पास यह रिकॉर्ड रहता था कि किस किसान ने कितना उत्पादन किया और कितना बेचा।
अब बिना रजिस्ट्रेशन के यह ट्रैक करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। इसलिए किसानों का सुझाव है कि प्रक्रिया आसान होनी चाहिए, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं, बल्कि सरल और ऑफलाइन विकल्प भी होना चाहिए। भुगतान को लेकर भी किसानों की उम्मीदें काफी स्पष्ट हैं। किसान चाहता है कि अगर वह सरकारी केंद्र पर गेहूं बेच रहा है, तो उसे तय समय के भीतर पैसा मिल जाए।
कई बार भुगतान में देरी होने के कारण किसान दोबारा सरकारी केंद्र पर जाने से कतराता है और निजी व्यापारियों को ही बेच देता है, चाहे दाम थोड़ा कम ही क्यों न मिले। इसलिए इस फैसले के साथ-साथ भुगतान प्रणाली को भी मजबूत करना बहुत जरूरी है। कुछ किसानों का यह भी मानना है कि इस फैसले से क्रय केंद्रों पर भीड़ बढ़ सकती है।
जब रजिस्ट्रेशन की बाध्यता नहीं रहेगी, तो अधिक किसान सीधे केंद्र पर पहुंचेंगे। ऐसे में अगर केंद्रों की संख्या और स्टाफ पर्याप्त नहीं हुआ, तो अव्यवस्था बढ़ सकती है। इसलिए किसानों की मांग है कि सरकार क्रय केंद्रों की संख्या बढ़ाए और तौल व खरीद की प्रक्रिया को तेज करे। एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि इससे बिचौलियों की भूमिका थोड़ी कम हो सकती है।
पहले कई किसान रजिस्ट्रेशन की परेशानी से बचने के लिए व्यापारियों को बेच देते थे, जो कम दाम देकर फायदा उठाते थे। अब अगर किसान सीधे केंद्र पर जाएगा, तो उसे सरकारी दर का लाभ मिल सकता है, जिससे उसकी आय में सुधार होगा।
कुल मिलाकर यह फैसला सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इसका असली असर तभी दिखेगा जब जमीन पर व्यवस्थाएं ठीक से लागू होंगी। किसान सिर्फ नियम बदलने से खुश नहीं होता, वह चाहता है कि उसकी मेहनत का सही दाम समय पर मिले, उसे बार-बार चक्कर न लगाने पड़ें, और पूरी प्रक्रिया सरल और पारदर्शी हो। अगर सरकार इन बातों पर ध्यान देती है, तो यह फैसला वास्तव में किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
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